एक दो क्या, लगा लो लगन और भी
By Ananth
एक दो क्या, लगा लो लगन और भी
आजकल है ज़रूरी ये फ़न और भी।
सिसकियाँ, क़हक़हे चुभते दोनों हैं पर
हाये, है ख़ामुशी की चुभन और भी।
कम हुआ जा रहा इख़्तियार-ए-बदन
चुभता है हमको ये पैरहन और भी।
ख़्वाब ऐसा दिखा जाने क्या रात भर
बढ़ गई सुब्ह उठके थकन और भी।
मैं तो वैसे भी खिड़की नहीं खोलता
क्या कहूँ है, नहीं है घुटन और भी।
बाग़ में गुल रहे, है ज़रूरी कहाँ
फूल महकेगा कल ख़ाक बन और भी।
By Ananth

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