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एक तरफ़ा प्यार

Feb 13, 2023
3 min read

By Akshar Tekchandani


पढता था मैं किताबों में,

देखता नायक के ख़ाबों में,

पर कभी न सोचा, की इक दिन,

मैं भी जाऊँगा सब कुछ हार,

क्योंकि हो गया मुझे भी,

एक तरफ़ा प्यार |


पहली नज़र का स्वांग नहीं,

जिस ओर वो चलदे, बस,

चलदे मेरी भी टांग वहीँ |


है उसका इक मनमीत,

शुरु में ही उसने बताया,

पर मन पे किसका बस है ?

फ़िर भी इसने स्वप्न सजाया |

उसको ख़ुश देख, मैं ख़ुश होता हूं,

पर विडंबना ऐसी,

की उसकी, सबसे बड़ी खुशी में,

मैं हँसता हूँ और मैं ही रोता हूँ |


ऐसा नहीं की वो जानती नहीं,

या ऐसा भी नहीं की मानती नहीं,

परंतु सालों से, किसी और की

अमानत है वो |

उसकी क्या गल्ती, की मेरे दिल की जेल,

व तन्हाई की भी ज़मानत है वो |


मुझे अपने, सबसे अछे दोस्तों में से

एक मानती है,

किसी कठिनाई में दिख जाऊं तो,

हर संभव प्रयास कर,

हल भी निकालती है |


पर मैं क्या करूँ ?

अपनी सबसे अच्छी दोस्त से,

प्यार जो कर बैठा हूँ |

उसकी खुशी और अपनी दोस्ती के बीच

ख़ुद ही सांप बन बैठा हूँ |



प्यार में इंसान, जीता है,

एक तरफ़ा प्यार में तड़पता है,

पर अपनी दोस्त, जिससे सबसे ज्यादा बात हो,

रोज़ मुलाक़ात हो;

उसपे दिल हारा इक तरफ़ा आशिक़,

न जीता है, ना है तड़पता,

बल्कि

हर रोज़, हर पल, है मरता |


मुझे कहती है,

की ये भावनाएं भूल जाऊं,

वो मेरे लिए अपने जैसी ही ढूंढेगी |

कहे की ऐसा न किया तो,

मेरी इक तरफ़ा मुहब्बत,

मुझे ही तकलीफ़ देगी |


उसकी दोस्ती भी तो नहीं खोना चाहता मैं,

कैसे उससे दूर हो जाऊं ?

मेरे भले के लिए ही समझाती है,

पर आखिर कैसे उसे भूल जाऊं ?


स्याही बिना क़लम सा

उस बिन हो मेरा हश्र;

बाख़ुदा नज़्म वो,

और वो थी ही मेरा नस्र |


कई बार प्रेम पर कविताएँ लिखी हैं,

पर इस बार तुकबंदी मिलाने में तो,

जैसे, क़लम काँप जा रही है |


क्योंकि पहली बार,

जो सिर्फ़ खिंचावट नहीं,

मुहब्बत हुई है, लगता है,

आज, न बुद्धि, न क़लम,

इसकी गहराई को माप पा रही है |


हर रोज़, जब दोस्तों के बीच, उससे मुलाक़ात होती है,

तो दिल के तूफ़ान को काबू रख,

मुस्कराने में, बेहद मुश्किलात होती है |


कभी चुप रहूँ या, बिन बताए निकल जाऊं,

तो झट पकड़कर, पट सवाल करती है,

क्योंकि, इतनी साफ़ है की,

सभी दोस्तों को बहुत ख़याल रखती है |


ना मुझसे प्रेम करती है,

कि रोक दूं अलफ़ाज़,

न मेरा दिल दुखाती है,

कि हो जाऊं नाराज़ |

जिसको भी वो दिल दे चुकी है,

सच, वो बंदा है बड़ा सरफ़राज़ (Blessed) |


ऐसी बीच लहर में फंसाकर,

मेरे मन में मलाल भरती है,

ऐ ज़िन्दगी, तू भी कर्म कमाल करती है,

हंसती-खेलती जिंदगानी में ही,

क्यों तू हमेशा बवाल करती है ?


थक हार कर सोचता हूँ:

अपनी तारीफ़ों के किस्सों में, इक पंक्ति हमारी भी जोड़ दे;

नज़रें जो फ़ेरी है, बस इक दफ़ा और इधर मोड़ दे |

क्योंकि ज़्यादा कुछ मांगने की तो मेरी ओकौत नहीं;

किस्मत में इश्क ना सही तो एक बार दिल ही तोड़ दे ||


पढ़ता था मैं किताबों में,

देखता नायक के ख़ाबों में,

पर कभी न सोचा कि इक दिन,

मैं भी जाऊंगा सब कुछ हार,

क्योंकि होगया मुझे भी,

एक तरफ़ा प्यार ||


By Akshar Tekchandani






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