एक तरफ़ा प्यार
By Akshar Tekchandani
पढता था मैं किताबों में,
देखता नायक के ख़ाबों में,
पर कभी न सोचा, की इक दिन,
मैं भी जाऊँगा सब कुछ हार,
क्योंकि हो गया मुझे भी,
एक तरफ़ा प्यार |
पहली नज़र का स्वांग नहीं,
जिस ओर वो चलदे, बस,
चलदे मेरी भी टांग वहीँ |
है उसका इक मनमीत,
शुरु में ही उसने बताया,
पर मन पे किसका बस है ?
फ़िर भी इसने स्वप्न सजाया |
उसको ख़ुश देख, मैं ख़ुश होता हूं,
पर विडंबना ऐसी,
की उसकी, सबसे बड़ी खुशी में,
मैं हँसता हूँ और मैं ही रोता हूँ |
ऐसा नहीं की वो जानती नहीं,
या ऐसा भी नहीं की मानती नहीं,
परंतु सालों से, किसी और की
अमानत है वो |
उसकी क्या गल्ती, की मेरे दिल की जेल,
व तन्हाई की भी ज़मानत है वो |
मुझे अपने, सबसे अछे दोस्तों में से
एक मानती है,
किसी कठिनाई में दिख जाऊं तो,
हर संभव प्रयास कर,
हल भी निकालती है |
पर मैं क्या करूँ ?
अपनी सबसे अच्छी दोस्त से,
प्यार जो कर बैठा हूँ |
उसकी खुशी और अपनी दोस्ती के बीच
ख़ुद ही सांप बन बैठा हूँ |
प्यार में इंसान, जीता है,
एक तरफ़ा प्यार में तड़पता है,
पर अपनी दोस्त, जिससे सबसे ज्यादा बात हो,
रोज़ मुलाक़ात हो;
उसपे दिल हारा इक तरफ़ा आशिक़,
न जीता है, ना है तड़पता,
बल्कि
हर रोज़, हर पल, है मरता |
मुझे कहती है,
की ये भावनाएं भूल जाऊं,
वो मेरे लिए अपने जैसी ही ढूंढेगी |
कहे की ऐसा न किया तो,
मेरी इक तरफ़ा मुहब्बत,
मुझे ही तकलीफ़ देगी |
उसकी दोस्ती भी तो नहीं खोना चाहता मैं,
कैसे उससे दूर हो जाऊं ?
मेरे भले के लिए ही समझाती है,
पर आखिर कैसे उसे भूल जाऊं ?
स्याही बिना क़लम सा
उस बिन हो मेरा हश्र;
बाख़ुदा नज़्म वो,
और वो थी ही मेरा नस्र |
कई बार प्रेम पर कविताएँ लिखी हैं,
पर इस बार तुकबंदी मिलाने में तो,
जैसे, क़लम काँप जा रही है |
क्योंकि पहली बार,
जो सिर्फ़ खिंचावट नहीं,
मुहब्बत हुई है, लगता है,
आज, न बुद्धि, न क़लम,
इसकी गहराई को माप पा रही है |
हर रोज़, जब दोस्तों के बीच, उससे मुलाक़ात होती है,
तो दिल के तूफ़ान को काबू रख,
मुस्कराने में, बेहद मुश्किलात होती है |
कभी चुप रहूँ या, बिन बताए निकल जाऊं,
तो झट पकड़कर, पट सवाल करती है,
क्योंकि, इतनी साफ़ है की,
सभी दोस्तों को बहुत ख़याल रखती है |
ना मुझसे प्रेम करती है,
कि रोक दूं अलफ़ाज़,
न मेरा दिल दुखाती है,
कि हो जाऊं नाराज़ |
जिसको भी वो दिल दे चुकी है,
सच, वो बंदा है बड़ा सरफ़राज़ (Blessed) |
ऐसी बीच लहर में फंसाकर,
मेरे मन में मलाल भरती है,
ऐ ज़िन्दगी, तू भी कर्म कमाल करती है,
हंसती-खेलती जिंदगानी में ही,
क्यों तू हमेशा बवाल करती है ?
थक हार कर सोचता हूँ:
अपनी तारीफ़ों के किस्सों में, इक पंक्ति हमारी भी जोड़ दे;
नज़रें जो फ़ेरी है, बस इक दफ़ा और इधर मोड़ दे |
क्योंकि ज़्यादा कुछ मांगने की तो मेरी ओकौत नहीं;
किस्मत में इश्क ना सही तो एक बार दिल ही तोड़ दे ||
पढ़ता था मैं किताबों में,
देखता नायक के ख़ाबों में,
पर कभी न सोचा कि इक दिन,
मैं भी जाऊंगा सब कुछ हार,
क्योंकि होगया मुझे भी,
एक तरफ़ा प्यार ||
By Akshar Tekchandani

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