एक तम्मना ऐसी भी!
By Sonu Khan
जन्नत की आरज़ू कभी की ही नहीं मैंने,
दिल थे बेगुनाह — उन्हें दुखाया नहीं मैंने।
सच कहना था, तो ख़ामोशी को ज़ुबां दी,
झूठ की राह कभी अपनाई नहीं मैंने।
जो चले गए, उन्हें रोका नहीं राहों में,
जो रुक गए, उन्हें खोया नहीं मैंने।
ज़ख़्म मिले तो चुपचाप सीने में समा लिए,
दर्द सहा बहुत — पर जताया नहीं मैंने।
रिश्ते निभाए बिना किसी सौदे के,
जिसे चाहा, उसे कभी आज़माया नहीं मैंने।
शोर में भी तन्हा, मुस्कराता रहा,
कभी किसी के आगे सिर झुकाया नहीं मैंने।
हर लम्हा सच का दामन थामे रखा,
पर हर मोड़ पर खुद को तनहा ही पाया मैंने।
By Sonu Khan

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