"एक ख़त ज़िंदगी के नाम"..!
By Shobhana Thakur
ऐ ज़िंदगी, हम तेरे एहसानमंद हैं —
कि तूने हमें क़ाबिल बना दिया..!
वरना पैदा होना तो बस एक दस्तूर है,
हम खुश-नसीब हैं कि तूने हमें, हमसे मिला दिया..!
बहुत कुछ याद है अब तक, थोड़ा कुछ याद नहीं,
दूध के दाँत टूट गए थे — पर कब तू आ गई, एहसास नहीं..!
ख़ैर, वक़्त बीतता गया, हम और क़रीब आते गए..!
तू मुझे अच्छी लगने लगी, पर पीछे कुछ छूट से गए..!
कागज़ की कश्ती अब मन नहीं बहलाती,
तितलियों के पंख अब पहले जैसे नहीं भाते..!
ऐ ज़िंदगी..! तुझे तो सब पता है — उस दिन तूने ही आकर मधुकर रस पिला दिया..!
वरना पैदा होना तो बस एक दस्तूर है..!
हम खुश-नसीब हैं कि तूने हमें, हमसे मिला दिया..!
ये कैसी दौड़ है जिसमें हम सोचें — कुछ बन जाएँ..!
आसमान झुक के देखे, और ज़मीन क़दम चूमे..!
भागते-दौड़ते हम थक तो गए थे..!
चेहरे पर झूठी मुस्कान लेकर दर्द सह भी गए थे..!
पर जब भी बिखरने लगे, तूने ही नई मंज़िल दिखा दिया..!
वरना पैदा होना तो बस एक दस्तूर है..!
हम खुश-नसीब हैं कि तूने हमें, हमसे मिला दिया..!
ऐ ज़िंदगी, तूने तो पूरा साथ निभाया..!
ये अलग बात है कि कभी-कभी बात बन नहीं पाया..!
सोचती हूँ — आज तेरा शुक्रिया करूँ..!
सबको छोड़, सिर्फ़ तेरे साथ जीऊँ..!
पर सबके साथ ही ज़िंदगी है — ये भी तो तूने ही सिखा दिया..!
वरना पैदा होना तो बस एक दस्तूर है..!
हम खुश-नसीब हैं कि तूने हमें, हमसे मिला दिया..!
ऐ ज़िंदगी, हम तेरे एहसानमंद हैं —
कि तूने हमें क़ाबिल बना दिया..!
By Shobhana Thakur

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