एक कहानी
By Saurabh Subhash Chand
एक कहानी जो उसने आईने से कही,
सोचकर कि ये तो मैं ही हूँ,
मेरा ही अक्स है उसमें,
इसने तो हमेशा मेरा साथ दिया है,
पर जब धीरे धीरे, उतर गया,
चमकीला रोगन , आईने का,
अक्स धुंधला-सा पड़ गया,
पता चला कि अब वो आईना नहीं,
कांच का एक टुकड़ा भर है,
तो ज़मीर के इतने टुकड़े हुए,
कि गिने ना गए....
पर हिम्मती तो बहुत था,
वही कहानी उसने अपने ईश से कही,
था ख़ुद से भी ज़्यादा यकीन जिसपे,
सोचकर कि ये तो मुझ पर स्नेह रखता है,
कह सकता हूँ मैं इसे, आरज़ू ज़हन की,
ईश तो ईश है, न हुई मंज़ूर अर्ज़ी,
लगा सदमा, दिल के हर उस कोने पर,
जहाँ तक भी हो सकता था एहसास ज़रा-सा,
जैसे लगी हो आग, गीले पत्तों में.....
फ़िर जो बुदबुदाई वही कहानी मन ही मन,
साँसों से निकली दिल की गर्म नमी,
विरह की महक फ़ैल गई शुष्क हवा में,
कोने में बैठकर महीनों रोई थी वो महक,
जस का तस आज भी मुझे है याद,
दर्द सारा सोखना चाहती थी,
थी ग़लतफ़हमी में सौ फ़ीसदी,
बदलता वक़्त किसी की कहाँ है सुनता,
तड़पती महक को निकाल दिया,
निरंकुश नोकीले अल्फाज़ी धक्के से.......
पहियों पे नाचता मोर जो देखा था,
रंगबिरंगा, उत्साहित, हुनरमंद, चंचल,
उम्मीद के सातवें आसमान से दिखाता,
ज़मीनी सच्चाई का, ताल्लूक जिस्मानी,
रेगिस्तानी दोपहरी में बारिश का हमला,
सब जगह ज़मीन - आसमान एक होते दीखते हैं......
वो सर्द हिमालय की पाक़ बर्फ का एक टुकड़ा,
अब आईना नहीं देखता, भगवान है, भरोसा है,
नहीं मांगता अब कुछ भी,
ज़मीन है, आसमान है, क्षितिज है,
पर दिल से निकाली गई बदबूदार महक,
आज भी टकटकी बांधे अनसुने सवाल करती है,
बता दो उसका कुसूर क्या था.......
By Saurabh Subhash Chand

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