"एक आज़ादी ऐसी भी"
By Atisha Anil Dhotre
वो जो तुम कहते हो उसे,
कि पहना करो कभी-कभी अलग-अलग परिधान,
कभी-कभी जीन्स टॉप पहनो,
पहना करो कभी मिनी स्कर्ट या वन पीस,
हेयरस्टाइल भी बनाओ हर रोज़ नई
क्या वही एक क्लच हर बार लगाकर आती हो?
थोड़ा मेकअप भी कर लिया करो कभी,
या सिर्फ़ लिपस्टिक ही सही।
और जब कभी उसका मन हो जाए ये सारी चीज़ें करने का,
और कभी वो कर भी ले,
तो तुम उसे ये भी कह देते हो कि,
"सलवार-कमीज़ में तुम ज़्यादा अच्छी लगती हो",
"ये फ़ैशन-वेशन तुम्हारे बस का नहीं,",
"तुम रहा करो एकदम सिंपल, वही तुम पर जचता है।"
पर मैं कहती हूँ,
क्यों बताओगे तुम उसे क्या पहनना है और क्या नहीं?
बाल बाँधने हैं या उन्हें खुला छोड़ना है
वो मेकअप करे या सिर्फ़ काजल और बिंदी लगाकर घूमे,
तुम्हें उससे क्या?
तुम क्यों बताओगे उसे कि वो कैसे रहेगी तो अच्छी लगेगी?
उसे तय करने दो कि उसे क्या पहनना है,
कैसे बनना-संवरना है,
कैसे दिखना है।
वो जानती है —
दुनिया किस ओर जा रही है।
बस तुम उसे अपने हाल पर छोड़ दो,
ये भी तो उसकी आज़ादी है
बिना कोई सवाल किए, और बिना कोई सुझाव दिए,
बस उसे जीने दो, जिस तरह वो चाहती है।
By Atisha Anil Dhotre

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