एक अफ़सोस!
By Arpita Yadav
थक कर सोचा कुछ,
अधूरी मुलाकात कर लूँ,
छूट गया जो कुछ पीछे ,
उसे ज़रा याद कर लूँ।
जमाना कहता करने को,
कुछ बचा ही नहीं,
देखे खाली कमरे, कुर्सियां और मेज,
तो लगा जिंदगी में कुछ रचा ही नहीं।
कितना कुछ के पीछे भागा हूँ मैं,
अब जो अपना बंजर मक़ा देखता हूँ मैं,
तो लगा मैं कुछ पा सका ही नहीं।
जिंदगी लादती गयी और,
मैं ढोता गया,
थोड़े थोड़े के चक्कर में ,
कितना कुछ होता गया।
कमबख्त था मैं,
सब हमारा समझता था,
जबकि जमाना तो बस,
लूटने का बंजारा समझता था।
सब कुछ बनाके,
जो अब बैठा हूँ मैं,
सोच रहा हूँ,
कितने बनाए मकानों में,
खुद रहता हूँ मैं।
मुझे गुरूर था कि,
बड़ी चौड़ में जीता हूँ मैं,
बन शहंशाह हर रोज़,
बस कुछ बूंद नमकीन पानी पीता हूं मैं।
बेवकूफ जो होते हम, तो लम्हें भी जीते
समझदार थे, इसलिए उम्र काट दी।
खुदगर्ज़ जो ठहरा होता, तो आज मैं खुद भी होता,
बेखुद था , इसीलिए उम्र हिस्सों में बाँट दी।
धन्यवाद।
By Arpita Yadav

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