उलट फेर
By Anirudh Rana
एक बज गया शायद ! रमेश ने पेड़ की छाया को देखते हुए अंदाज़ा लगाया | एक पेड़ का ही सहारा था जो उसे आसमान से शोलों की तरह दहकती धूप से राहत देता था | पिछले ३ सालो से इसी पेड़ के साथ उसने कई पल बिताये थे, धूप भी तो बारिश भी | दिन होते-होते धंधा भी मंदा होने लगता था | सुबह और शाम ठीक-ठाक बिक्री हो जाया करती थी | सड़को पर एम्बुलेंस की अचानक बढ़ती संख्या को देख कर उसने अंदाज़ा लगा लिया था कि जल्दी ही लॉक डाउन लग सकता है | पिछली बार तो गांव चला गया था परिवार सहित, पर अब रही सही बचत राशि भी ख़त्म हो चुकी थी | कहीं जाने का मतलब ही नहीं था अब तो | ऐसा लग रहा था मानो मौत निश्चित है, चाहे भूख से आये या कोरोना से |
हालांकि, वह फैसला कर चुका था की हालातों का सामना करेगा | मृत्यु जब आनी हो तब आये, जब तक ज़िंदा है उम्मीद नहीं छोड़ेगा | उसे जीवन का उलट-फेर समझ नहीं आ रहा था | अचानक से कैसे एक विषाणु ने पूरी ज़िन्दगी पलट के रख दी थी | कैसे जीवन की रेल गाडी कुछ महीनो में पटरी से उतर गयी थी | तभी बत्ती लाल हुई और फर्राटा भरती गाड़ियों के पहियों के साथ साथ जैसे समय भी थम गया | रमेश फिर दौड़ पड़ा अपना झोला उठाये, 150 के २ मोबाइल कवर बेचते हुए | ३ मिनट बाद बत्ती फिर हरी हुई | गाड़ियों के पहिये घूमे तो रमेश का समय फिर थम गया कुछ देर के लिए | पेड़ के निचे बैठे उसे यह भी उलट-फेर ही लग रहा था की कैसे एक के थम जाने पर दूजा चल पड़ता है !
By Anirudh Rana

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