उलझती है कभी यूं भी
By Usaid Shaikh
उलझती है कभी यूं भी; मेरे अल्फाज़ से धड़कन खमूशी की ज़बां सुनने की जैसे हो सज़ा ये भी यहां मिट्टी की खुशबू भी परेशां हाल लगती है शहर की बारिशों में हो चली ना आशना ये भी संभल जाऊं जो खुद तो हाल दिल का पूछने बैठूं मुझे लगता है अब के है बहोत टूटा हुवा ये भी
मैं शायर हूं मेरे एहसास ही से मेरी दुनिया है
मगर क्या हो अगर निकले मेरा दुश्मन; छुपा ये भी
नहीं आसां बड़े बूढ़ों की बातों को गलत कहना
मगर हसरत मेरे दिल में रही है कुछ सिवा ये भी
ना आशना = अंजानी
हसरत =
लालसा, इच्छा, पश्चात्ताप, अफ़सोस
By Usaid Shaikh

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