उर्मिला की शिकायत
By Disha Kedia Gupta
गो स्वामी तुलसी दास जी से एक शिकायत.
तुलसी!
मैं लक्ष्मण की पत्नी हूँ, तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ.
तुमने राम चरित मानस लिख डाला,
पर अन्याय मेरे साथ कर डाला.
मानस जन मानस में छाया पर तुलसी तुमने मुझे क्यूँ छिपाया?
तुम्हारे राम गये बनवास, अपनी सीता को ले गये साथ.
पर मै अभागन क्या करती?
क्या लक्ष्मण के दुःख में मरती?
माँ कैकेयी को था किसने देखा?
कौशल्या माँ को किसने सम्भाला?
पर तुमने मेरी सारी सेवा को अनदेखा कर डाला.
माना तुम राम भक्त हो, राम गुण गाते हो,
पर मेरे नाम से तुलसी इतना क्यूँ घबराते हो?
गये मेरे प्राण प्रिय वन में,
मुझसे तो कह कर जाते.
हाय, मैं अभागी सोच रही, प्रिय अभी आते बस अभी आते.
पर तुम्हें मेरी पीड़ा से क्या लेना.
तुम तो सीता राम ही गाते हो.
पर इतना तो समझाओ मुझे, तुम मुझसे क्यूँ घबराते हो?
चौदह बरस चुपचाप सहे,
नहीं कभी कुछ बतलाया,
पर तुम्हारा राम बिन सीता कैसे था घबराया.
माना राम महान थे, माँ सीता से भी नहीं ईर्ष्या कोई.
पर मैं भी दशरथ जी की कुलवधू, लक्ष्मण जी की पत्नी हूँ.
मुझे मेरा हक़ दिलवाते,
बस एक बार, बस एक बार मुझे लक्ष्मण कह कर तो जाते.
और एक बार तुम भी,
मानस में मुझे जन मानस से मिलवाते.
By Disha Kedia Gupta

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