उम्मीद की किरण
By Deeksha Kohli
एक पेड़ है, पत्ते नहीं शाखों पर, फ़िर भी अड़ा है,
फ़िर बहार आने की उम्मीद में बाहें फैलाए खड़ा है।
एक मनुष्य है, जो हर परेशानी में टूट जाता है
निराशा के साए में, सब से, रब से भी रूठ जाता है।
लेकिन समझने की है बात,
कि वक़्त रुकता नहीं , बदल जाता है।
ये वक़्त बदलेगा और फ़िर पुराने दिन आएंगे।
देखना हम मिलकर, ये जंग जीत जाएंगे।
एकजुटता से लिखेंगें हम नई इबारत
हारेगा कोरोना, जीतेगा भारत
By Deeksha Kohli

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