उम्मीद
By Sakshi Singh
उसकी रातें निकल रहीं
सवेरे के इंतजार में
है कुछ आंखों में उम्मीद
'कल' न दिखे अंधकार में
वो शख्स उलझा है मगर
खयालों के बाज़ार में
ढूंढ रहा खुशी वो
उलझनों की दुकान में
कहीं गुम सा हो गया
नासमझी की दरार में
बस तलाश ले वो खोया फरिश्ता
अपने ही किरदार में
खुद ढूंढ कर मंजिल का पता
बना ले वो जीवन-यात्रा प्रकाशमय।
By Sakshi Singh

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