उम्मीद
By Sanjay Kumar Upadhyay
सबके दीवारों दर हो चुके मोम के ,
उम्मीद दीपक की अब ना लगाया करो..!
मुझको पाने की कोशिश भी कर लो कभी,
बेवजा यूं न नजरें मिलाया करो..!!
मेरी हसरत यहां है सभी को मगर,
इस कदर यूं ना जुल्फें उड़ाया करो..!!
मुझको टीके लगाने की आदत है उसकी,
देख इनको न पलकें झुकाया करो..!!
रात आधी है मेरी फलक से तो देखो,
इस कदर यूं ना सुबहें गंवाया करो..!!
सारे इत्रों से महंगी है खुशबू मेरी,
देख कर यूं ना वापस गिराया करो..!!
चंद लम्हों की पलकों के दीदारेखातिर,
न यूँ झरोखों को इतना सताया करो..!!
रात जागी है सुबहें समेटे हुए ,
पलकें भारी हैं फिर भी उठाया करो..!!
मौन से मौन तक का सफर ही सही,
जिस्म की रूहे-रफ़्तार यूं ना बढ़ाया करो..!!
जलने लग जायेगा ये बदन चांदनी रात में,
ना रोज़ ख़्वाबों में मुझको बुलाया करो..!!
नोच खायेंगीं यें ज़ुल्फ़ें ही इक दिन तेरे जिस्म को,
इस कदर ना यूँ कन्धों से इनको हटाया करो..!!
मर्म जिस्मों का रूहों ने समझा ही कब है,
भूलकर भी ना इनको मिलाया करो..!!
By Sanjay Kumar Upadhyay

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