उफ् ! ये बरसात
By Aqeel Agaz
पानी के टपके के डर से सारी रात आंखों में काटने के बाद भोलेराम चौधरी अपने मित्र चिंतामण्यी से पूछ बैठे कि उन्हें भी रात में नींद आई कि नहीं? यह प्रश्न पूछकर संभवत: वह तसल्ली करना चाहते थे कि रात भर जागने वाले वह अकेले तो नहीं है। चितामणयी ने बताया कि वह भी रात भर इस डर से नहीं सो पाए कि नालियों की बगावत के कारण बरसात का पानी भ्रष्टाचार की तरह बैडरूम में घुसकर ईमानदारी की तरह कीमती सामान को बहाकर ना ले जाए। नालियों की गंदगी चौके में घुसकर पश्चिमी सभ्यता की तरह खाने पीने की चीजों में मिलकर शरीर के अंदर प्रवेश ना कर ले और अलमारी में रखे कपड़ों पर बेशर्मी के दाग ना लग जायें। इतना बड़ा जवाब सुनकर भोलेराम के मन से भारी असंतोष का पत्थर हट गया और उन्होंने चैन की साँस ली और संतोष किया कि जागने की तकलीफ सहने वाले वह अकेले नहीं हैं।
बरसात का मौसम जितना भारत में चर्चित व लोकप्रिय है, किसी और देश में शायद ही हो। आपने भारतीय साहित्य के अलावा किसी और साहित्य में इस ऋतु का इतना बखान नहीं पढ़ा होगा। हिंदी और उर्दू के शायरों ने जितने शेर व कविताएं इस मौसम पर लिखी हैं किसी और ऋतु पर नहीं लिखी गई। हमारी फिल्म इंडस्ट्रीज को तो यह ऋतु इतनी पसंद है कि हर दस फिल्मों में से नौ फिल्मों में नायिका को बरसात में भीगता दिखाना निर्माता-निर्देशक अपना फर्ज समझते हैं। रोमांटिक गाना हो या रैप सीन, बरसात का पानी बीच में जरूर आयेगा। हॉरर फिल्मों में आंधी तूफान के साथ भीगती खूबसूरत प्रेत आत्मा से दर्शक डरे न डरे, भीगे वस्त्रों से झांकते सुंदर शरीर को देख चीखों के साथ सीटियां भी खूब बजाते हैं, नतीजतन प्रोडयूसर को फिल्म बानने में लगे पैसे की भरपाई के साथ भारी मुनाफे की गारंटी भी मिल जाती है। अपनी टी.आर.पी. बढ़ाने के चक्कर में अब तो टी.वी. सीरियल वाले भी बरसाती पानी में उत्तेजक दृश्य दिखाने से खुद को रोक नहीं पा रहे हैं और खबरिया चैनल वालों के लिए तो यह मौसम किसी उत्सव से कम नहीं है। हर प्रकार की चटपटी खबरें हो या दिल दहला देने वाले हादसों के दृश्य खुद चलकर उनके कैमरों में कैद हो जाते हैं।
चिंतामणि ने नालियों की बगावत के मद्देनजर शासकीय एहतियाती कदम उठाते हुए नाली में पड़े कचरे का बाहर निकालने से बेहतर कचरे को ढकेलने के लिए बम्बू का सहारा लिया और कचरे के ढेर को आगे ढकेल दिया। फिर पास खड़े अपने मित्र भोलेराम से अपनी चिंता जताई, जिस तरह पिछले कई सालों से बरसात ने पूरी मुंबई को जाम कर दिया था क्या इस बार भी बरसात ऐसा ही नजारा हर बड़े शहर में पेश करेगी? भोलेराम ने बड़े ही भोलेपन से कहा तुम्हें चिंता करने की आवश्यक्ता नहीं है।
इस समस्या के समाधान के लिए अपने देश के राजनेता उच्च अधिकारियों के साथ विदेश जाकर बहुत कुछ सीखकर आए हैं और इतना ही नहीं इन लोगों ने यह प्रतीज्ञा ली है कि जब तक यह समस्या रहेगी, बारी बारी बाकी लोग भी विेश जाकर समस्या का समाधान ढूंढते रहेंगे। चिंतामणी ने फिर आशंका जाहिर की कि हमारे प्रशासनिक अधिकारी इस समस्या के स्थायी हल के बारे में क्यों नहीं सोचते? हर वर्ष करोड़ों, रुपये बाढ़-सूखा राहत पर खर्च करने से तो अच्छा है, इस समस्या का स्थायी हल निकाल लिया जाए। भोलेराम ने मासूमियत से कहा हल निकल गया तो राहत कार्यों के नाम पर जो पैसा मिलता है, वह बंद हो जायेगा। हमारे अफसर हों या नेता समस्याएं खत्म नहीं करते हैं बल्कि दुधारू गाय की तरह पालकर रखते हैं। चिंतामणी को भोलेराम से इतने स्पष्ट उत्तर की उम्मीद नहीं थी, उनका यह उत्तर सुनकर उनके माथे पर चिंताओं की कुछ और रेखाएँ उभर आई और उनके मुखार्बिंद से पंक्तियां प्रस्फुटित हुई कि-
“जब भी मिलते हो तो बारिश का म देते हो
और कहते हो कि बरसात से डर लगता है।”
By Aqeel Agaz

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