उपेक्षित
- Hashtag Kalakar
- Dec 2, 2025
- 1 min read
By N Veyra
मैं एक कोने में बैठी हूँ,
भीड़ भरे घर में पर बिल्कुल अकेली।
मेरी गुड़िया भी अब मुझसे रूठ गई है,
शायद उसे भी मेरी चुप्पी भारी लगती है।
लोग कहते हैं… मैं बहुत चुप रहती हूँ,
पर क्या कभी किसी ने पूछा,
मेरे पास बोलने के लिए है भी क्या?
जब मेरे शब्द हमेशा अधूरे छोड़ दिए जाते हैं।
मेरी हँसी दीवारों से टकराकर लौट आती है,
मेरे आँसू अक्सर तकिए में ही सूख जाते हैं।
कभी मैं सोचती हूँ,
क्या मैं सच में इस घर का हिस्सा हूँ,
या सिर्फ एक परछाईं
जिसे देखा तो जाता है, पर समझा नहीं जाता।
कभी खिड़की से बाहर झाँकती हूँ,
जहाँ दूसरे बच्चे खेलते हैं,
उनकी आँखों में चमक है,
उनकी हथेलियों में रंग है।
और मैं?
मेरे हाथों में बस अधूरी कहानियाँ हैं,
और आँखों में बेमानी इंतज़ार।
मेरी छोटी उम्र का भार
मेरे मासूम कंधों से कहीं बड़ा है।
कभी सोचती हूँ,
काश कोई मेरे सपनों को भी सहलाता,
जैसे लोग फूलों को संभालकर रखते हैं।
फिर भी, दिल के किसी कोने में
एक नन्हीं-सी आशा पलती है
शायद कल कोई मुझे देखेगा,
मेरी चुप्पी में भी आवाज़ सुन पाएगा,
और कहेगा
“तुम भी मायने रखती हो,
तुम्हारा भी एक संसार है।”
उस दिन शायद मैं भी खुलकर मुस्कराऊँगी,
गुड़िया को सीने से लगाऊँगी,
और कहूँगी
अब मैं अकेली नहीं हूँ।
By N Veyra

Good
Awesome
Be brave and keep writing
It breathed
You are close to being a professional writer