उध्दार
By Sharon Mohan
मुझे वाकिफ कर दे जा;
यह मन किनारा ढूंढ रहा है,
तेरे दहलीज पे खड़ी सुन्नु मैं;
यह दिल शरण मांग रहा है,
यह रूह उद्धार मांग रहा है|
उन बेड़ियो में खड़ी कैद मैं;
यह आत्मा आज़ादी के लिए तरसता है,
उन जजीरो के उत्पीड़न से;
यह दिल मुक्ति मांग रहा है,
यह रुह उध्दार मांग रहा है।
उन खुले ज़ख्मो के दर्द से;
यह काया दृढ़ता की कामना करता है,
उस टपकती खून के पीड़ा से;
यह सीना राहत मांग रहा है,
यह रूह उद्धार मांग रहा है।
यह मर्मव्यथा की दास्ताओं के कष्ट से;
यह दिल शांति की गुजारिश करता है,
उन अश्रुपूरित आँसुओं की वेदना से;
यह अंतःकरण सांत्वना की दरख्वास्त करता है,
यह दिल रिहाई माँग रहा है;
यह रूह उद्धार मांग रहा है।
By Sharon Mohan

Beautiful poem
👏🏻👏🏻
Amazing