उखड़ी नज़्म
By Ananth
कई बारी हुआ है यह
कि मेरी नज़्म अधूरी इक
ख़फ़ा हो जाती है मुझसे
कभी चुप चाप रोती है
मगर ऐसा भी होता है
कि अपने टूटे-फूटे मिसरे जैसे हों नुकीले दाँत
मुझको वो दिखाके ग़ुस्से से गुर्राती है
तकती है लाल आँखों से मुझको वो
सबब दर-अस्ल होता है
कि मेरा ध्यान उससे दूर
और इक मौज़ू की सम्त
खिंच जाता हैं
जो उससे नहीं बर्दाश्त होता है
वो शायद जलती है
उन सब पलों से
ज़हन में मेरी जो ताज़ा ताज़ा नज़्में पैदा करती हैं
तसव्वुर करती है सरगोशियों से ख़तरा है उसको
वफ़ा पे मेरी शक करती है
वो इक नज़्म अधूरी सी
किसी ने शायद उसको ये ख़बर दी है
कि मैं वो हूँ
जिसे सिर्फ़ इक मुहब्बत से तसल्ली तो नहीं होती
By Ananth

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