उकूबत-ऐ-ज़िंदगी
By Keyur Joshi
उक़ूबत-ऐ-ज़िंदगी से मैं अब डरता नहीँ हूँ,
बहस तो रोज़ होती है, मैं मरता तो नहीं हूँ...
गर मसर्रत नही मेरे साथ तो वक़्त ज़ाया करना मत,
मैं अकेला तो हूँ मगर तन्हा नहीं हूँ...
यह इश्क़ में जी हुज़ूरी मुझसे नहीं होती,
हाँ मैं आशिक़ तो हूँ मगर दीवाना नहीं हूँ...
माना के शिकस्त खाई है हर किसी से मैने,
मगर अभी मैं खुदसे हारा तो नहीं हूँ...
आज़माकर ज़माने को तुम खुश लगते नही हो,
सुनो, मैं आज भी वही हूँ कही गया नही हूँ...
कुछ बातें, मुलाक़ातें और लम्हें याद रखे है मैंने,
कैसे सब भुला दूँ , मैं तुम तो नही हूँ...
By Keyur Joshi

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