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ईश कभी तुम नारी होकर आना

Apr 24, 2024
2 min read

Updated: Jul 24, 2025

By Richa Singh


ईश कभी तुम नारी होकर आना

ईश कभी तुम नारी होकर आना,

दुखों की अधिकारी हो कर आना।

पूर्ण पुरुष तुम, पुरुष के तुमने लिए कई अवतार, 

एक बार इस धरती पर अवतारिणी हो कर आना।

ईश कभी तुम नारी होकर आना।


अर्धांगी है रूप तुम्हारा, फिर क्यों स्वरूप बस पुरुष तुम्हारा?

एक बार तो एक बेटी, एक पत्नी, एक बहु, एक महतारी होकर आना।

ईश कभी तुम नारी होकर आना।


जब जन्म तुम्हारा होगा, शोकाकुल हर मन होगा।

कोई खुशी न मनाएगा, कोई गीत नहीं गाएगा।

सब खुद को समझाएंगे , पहली है चल जाएगा।

ईश कभी तुम धरती पर दूसरी होकर आना।

ईश कभी तुम नारी होकर आना।


जब युवा तुम हो जाओगी, घर पर चिंता छाएगी,

तुम योग्य भी हो और कुशल भी, 

हर दिल की दुलारी भी,

पर तुमको जाना होगा, घर नया ही बसाना होगा ।

 पर साथ तुम्हारे जाने को, संपति कहां से आएगी?

ये चिंता भी तुम छोड़ो, तुम लक्ष्मी संग ले आना।

पर एक बार इस धरती पर नारी तो होकर आना।

ईश कभी तुम नारी होकर आना।


जब ब्याह तुम्हारा होगा, तब परमेश्वर तय होगा।

अस्तित्व को खोकर अपने, तुम्हें उसकी होना होगा।

जो प्रेम भी शर्तें रखे, उस 

प्रीतम की तुम प्यारी होकर आना।

ईश कभी तुम नारी होकर आना।


कर्तव्यों की अधिकारी होकर आना

जब उस घर में तुम रहना, शर्तों को निभाते जाना।

कभी अपनी कुछ न कहना, बस उनकी सुनते जाना।

उस घर में सबसे तुच्छ, निर्बल, बेचारी होकर आना,

कैसे मैं कहूं अब तुमसे, के तुम नारी होकर आना !

पर सत्य यही है, नारी जीवन का दंश यही है।

नारी को ही कहते हैं अबला, तथ्य यही है।

सीता को भी देखा तुमने, मंदोदरी को भी देखा

आदर्श हैं दोनो ही, दोनों के भाग्य दुखों की रेखा।

कुंती को भी देखा तुमने, द्रोपदी को भी देखा,

मदद तो की, क्या हृदय की टीस को भी पाकर देखा?

हे ईश, तुम्हारी सृष्टि है, पर नारी एक समष्टि है।

तुम पुरुष रहे, नारी न हुए

क्यों जग सी तुम्हारी दृष्टि है ?

तुम मानो या न मानो, मुझे इतना है कह जाना।

हे ईश कभी तुम नारी के हृदय को पाना।

समदृष्टि रखते हो तो तुम नारी होकर आना ।


By Richa Singh

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