ई.एम.आई.का ताज
- Hashtag Kalakar
- Nov 25, 2025
- 1 min read
By Sushmita Sharma
घर की हर एक ईंट,
एक-एक दिन की किश्त बनी,
सजावट का सामान बना,
ऋण का ब्याज,
सपनों का घर बनाने के लिए,
अपनों को छत दिलाने के लिए,
मिडिल क्लास पहन रहा,
“ई.एम.आई.” का ताज ।
बच्चों की खुशियाँ पूरी करते,
उनके भविष्य को बनाने के लिए,
खुद की खुशियाँ भूल कर,
उन्हें ऊँचा उठाने के लिए,
कमी न हो किसी चीज की,
सुरक्षित महसूस कराने के लिए,
मिडिल क्लास पहन रहा,
“ई.एम.आई.” का ताज ।
समाज में रुतबा बना रहे,
लोगों में सम्मान रहे,
जिल्लत किसी की आँखों में न हो,
जिंदगी में आराम रहे,
कभी भ्रम की चकाचौंध में,
कभी गम की गहराइयों में,
मिडिल क्लास पहन रहा,
“ई.एम.आई.” का ताज।
रेत के दलदल की तरह,
निकलने की न कोई युक्ति,
शिकंजा मजबूत हो रहा,
नहीं है इससे कोई मुक्ति,
चक्रव्यूह है यह जानकर भी,
फँस रहा हर कोई आज,
मिडिल क्लास पहन रहा,
“ई.एम.आई.” का ताज।
By Sushmita Sharma

Very nice 👍
VERRY NICE
True indeed
Wow, that's a unique perspective on EMI! Your poem really captures the struggles of managing finances. Loved the way you've expressed it!
Amazing lines.. this is fect of life