इसलिए खामोश हूँ, पापा…
Updated: Jul 25, 2025
By Jaya Shree Devkar
बातें अनकही, एक खामोशी सी,
पिता के बिना एहसास अधूरा सा है।
इसलिए खामोश हूँ, पापा, बोला नहीं जा सकता,
पर चुप्पी में छिपी, एक गहरी मोहब्बत है।
हर मुस्कान, हर रौनक, तुम्हारी यादों में है,
जीवन के संगीत में, तुम्हारी ध्वनि बसी है।
इसलिए खामोश हूँ, पापा, तुम्हारी शिक्षाएं मानी हैं,
चुप्पी में ही तुम्हारी बातें, सच्चाई से भरी हैं।
जीवन के सफर में, तुम्हारा साथ है सदा,
हर कदम पे, तुम्हारी यादें मिलती हैं बड़ी मददगार।
इसलिए खामोश हूँ, पापा, तुम्हारे त्यागों को याद कर,
चुप्पी में ही तुम्हारा प्यार, सोने से भी अधिक चमकदार।
अब नए जीवन के सफर में, तुम्हारी यादें साथ हैं,
हर क्षण, हर पल, तुम्हारा साथ संगीत बनता है।
इसलिए खामोश हूँ, पापा, तुम्हारी मानसिक स्थिरता के लिए,
चुप्पी में ही तुम्हारा प्रेरणास्त्रोत, अपना रास्ता बनता है।
अलग-अलग राहों पर, हमारा प्यार अटूट है,
इसलिए खामोश है, हमारा प्यार बयां हो जाता है।
इसलिए खामोश हूँ, पापा, रात की चुप्पी में,
तुम्हारा प्यार, चमकता है सितारों की भांति उजियार में।
इसलिए यहाँ मैं लिखती हूँ, कलम हाथ में,
जो कहना है, वो कह पाना मुश्किल है इस दिल से।
इसलिए खामोश हूँ, पापा, शब्दों में सीमित हो जाता है,
मैं तुम्हें कितना प्यार करती हूँ, ये सब चुप्पी में बयां होता है।
By Jaya Shree Devkar

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