इस सावन दरस दिखा जाना
By Prakash Kumar Shukla
सूनी आँखो को प्रियतम इस सावन दरस दिखा जाना,
बीते सावन मेरी ख़ातिर तुम मोती के बूंदे लाए थे,
पर किसके हित मैं बूंदे डालूँ? किसके हित श्रिंगार करूँ?
किससे मैं रूठूँ-मानूँ? किस पर मैं अधिकार करूँ?
प्रियतम तुम इस बार भले ही ख़ाली हाथ चले आना!
सूनी आँखो को प्रियतम इस सावन दरस दिखा जाना!
लिपा-पुता यह आँगन मुझको उजड़ा-उजड़ा लगता है,
ना जाने क्या चाहत इसकी क्यूँ-क्यूँ उखड़ा-उखड़ा लगता है?
इक बार तुम इस पतझड़ मन को मधुवन करने आ जाना,
सूनी आँखो को प्रियतम इस सावन दरस दिखा जाना!
माना वह बाबुल का आँगन प्यार मुझको थोड़ा था,
पर तज के हर नाता अपना एक नाता तुमसे जोड़ा था,
है याद मुझे मैं रोयी थी, जब पीहर मैंने छोड़ा था,
अब हँस लेती हूँ, बन पगली मैं अपने ही आपे में,
भरकर अपनी बाहों में जी भरकर मुझे रुला जाना।
सूनी आँखो को प्रियतम इस सावन दरस दिखा जाना!
टिप-टिप गिरती बरखा आँगन में, झर-झर बहता आँखों से सावन,
भीगा है तन, भीगा है मन,सब कुछ भिगाते हैं भींगे नयन।
भीगी है खिड़कियाँ काँच की, भीगा है उनपे नाम तुम्हारा!
इक तुम्हारा नाम ही है, मुझको और किसका सहारा?
सुध ना आती हो मेरी तो फ़िक्र करते चले आना,
सूनी आँखो को प्रियतम इस सावन दरस दिखा जाना!
माना व्यंजन खूब मिलेंगे सजी शहर की गलियों में,
क़सम मेरी तुम खो ना जाना, उर छलती रंगरलियों में!
रूप मिलेगा श्रिंगार मिलेगा, पर जानो ना प्यार मिलेगा!
ना कोई अधिकार मिलेगा, ना कोई घर-बार मिलेगा!
देखो सौत ना लाना मेरी-मौत भले ही ले आना,
सूनी आँखो को प्रियतम इस सावन दरस दिखा जाना!
By Prakash Kumar Shukla

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