इस बार
By Anurag
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
सामने से एक दफा और निहारना है
तुम्हारी आँखों में देखना नहीं है
तुम्हारी पलकों के झुकते और उठते हुए देखना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
तुम्हारी जुल्फों को एक दफा और उलझाना है
तुम्हारी जुल्फों में खोना नहीं है ,
उन्हें फिर प्यार से सुलझाना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
तुम्हारी गोद में सोकर सब कुछ भूल जाना है
तुम्हारे हाथो को अपने सिर पे महसूस करना है
तुम्हारे खुसबू में खो जाना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
तुम्हे गले लगाकर अपनी धड़कनो की आवाज़ सुनना है
तुम्हे किसी बहाने से उठाकर फिर से हाथ पकड़ कर बैठना है
तुम्हे अपना टच फील करवाना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
तुम्हे अपनी कमी महसूस करना है
तुम्हे एक बार फिर से अपना बनाना है
बहुत हो गयी फ़ोन पर बातें , सामने से तम्हे अपनी आवाज़ सुनाना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
इश्क़ का पता नहीं मुझे पर तुम्हे अपनी मौजूदगी महसूस कराना है
आईने में तो खुद को रोज़ देखती होगी, इस बार मेरी आँखों में तुम्हे अपना चेहरा दिखाना है
खूबसूरती के कसीदे तो रोज़ पढ़ते है, इस बार तुम्हारी खूबसूरती से तुम्हारा परिचय कराना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
मेरी तो पहले ही हो गयी थी तुम ,तुम्हे तुम्हारा हक़ बताना है
खाली परी मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे भरे रंग दिखाना है
एक kiss से क्या होगा , मुझे तुम्हे गिन ना पाओ उतना kiss करवाना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
कही कुछ कमी हुई भी होगी तो ,तुम्हारा सब कुछ बन जाना है
वादे तो बहुत से किए है , इस बार कुछ वादें निभाना है
दिल में तो बसा लिए है कबसे तुम्हे , इस बार अपनी सोच मे तुम्हे डूबाना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
मुझे भूलेगी नहीं पर एक तोहफा देकर खुद को हमेसा याद करवाना है
माना की मैं तुम्हे ये पहले भी दे सकता था , पर इस बार ही क्यों दिए ये बात समझना है
मालूम है मुझे की तुम दिल से क़ुबूल करोगी फिर भी तेरे इश्क़ की इबादत में एक बारऔर गुहार लगाना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
शुरुआत तो बस तुम्हे देखने से हुई थी पर अब ये इश्क़ रूहानी हो गयी है ये समझाना है
याद तो पहले भी करती होगी तुम, पर अब ये हर दिन की कहानी हो गयी है ये बताना है
एक बार प्यार से बस प्यार कर लेना मुझको ये ज़िद मेरी है , ये जताना है
ये रिश्ता हमारा बस इत्तेफ़ाक़ भर ही नहीं है ,
अगर है भी तो ये इत्तेफ़ाक़ इश्क़ की जबानी हो गयी है , ये एहसास कराना है
ये जो लकीरे है तुम्हारी हाथों में वो मेरी ज़िन्दगी की सानी हो गयी है , ये भी इफ्तिखार कराना है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
इस बार मुझे तुमसे बस मिलना नहीं है
By Anurag

Comments