इन्तजार
Updated: Jul 18, 2025
By Karishma Sanghvi Parekh

अक्सर वक्त से शिकायत रहती हैं इस बेइंतहा “इन्तजार” के राज- ए- सिफत
या काबिल-ए-इश्क के मुनासिब होने के जिक्र से सजी यादों का काफिला इनायत हुआ हैं हमें…….
फिर वक्त ने भी सहम के फ़रमाया;
कि ना पूछो उस इश्क का मतलब जो कभी किसी को मुकम्मल होने को कयामत के बराबर हो;
यूं तो अरसा हो गया फकीरों को इस कैफियत में भटकते हुए; तुम तो नये नये मुसाफिर हो!!!
कई ख्वाहिशें कई कामयाबियों के दस्तुर देखें है,
कई हंसते – रोते अल्फ़ाज़ सुनें है;
हर बार मिलते और सुनाते किस्से और कहानियों में बदलते किरदार बयान करते हैं ;
जब मिली थी हसीन मंजिलें तो गुम थे खुशनुमा माहौल की रंगीन गहराईयों में;
ना समझना था ना पहचानना था महज इत्तेफाक की घड़ियों से बदलते मौसम के रुख़ को,
जब नींद खुली, समझना था उन्हीं मजबूरी और मलाल-ए-मुकद्दर को…
फलसफा तो यह है कि वही टिक पाया है जो समझ पाया है इस एहसास को खुद अपने ही अंदाज में;
वही कैफ है जो जिना सिखाया करते हैं यह बेफिक्रे काफिराना वक्त से परे जिंदा रहने को।
By Karishma Sanghvi Parekh

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