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इतना शांत क्यों रहता हूँ

By Deependra Srivastava


लोग कहते इतना शांत क्यों रहता हूँ

जिंदगी के मज़े क्यों नहीं लेता हूँ

जिनके मज़े की परिभाषा इतनी सीमित हो

जिनमे विशालता देखने की ना नज़र हो


उन्हे अपने मज़े कैसे बताऊ मै

मैंने देखा अपने ही अंदर रहस्यों को है

मैंने देखी दुनिया ऐसी जो सत्य से प्रकाशित है


मन के नाटक कई हजार देखे

अपनी नादानियों के नज़ारे देखे

हूँ अचंभित और भयभीत भी

पर यही कर रहा आनंद का श्रोत भी

अनुभव जो ऐसा पाएगा भला वो सीमित मज़े मे क्यों ही

जाएगा

अब मन को गहराईयों मे आनंद आयेगा

चीजों को उसके तत्व से जानने और पढ़ने मे मज़ा आयेगा

भक्ति का रस उसे अब समझ आयेगा

रिश्तों मे वो अब गहरा जाएगा

छोटी – छोटी चीजों मे आनंद आयेगा

जिंदगी के संघर्षों को वो श्राप से वरदान साबित करता

जाएगा


मज़े का केंद्र अब अंतर्मन कहलाएगा


By Deependra Srivastava

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