इक ख़त और।
By Ajeet Singh
मैं अक्सर लाल रंग से लिखे
तुम्हारे ख़त पढ़ा करता हूँ
वो क्या है ना
अंधेरा बहुत रहता है आज कल
तुम्हें पढ़ता हूँ
तो तुम कमरे भर में
बिखर जाया करती हो
क्या तुम कभी थी भी
यहाँ या बस मैंने
किरदार तुम्हारा बना रखा है
ख़ैर होने में क्या रखा है
मेरे कमरे में रोशनी
फिर कर दो
मुझे इक और ख़त
लिख do
By Ajeet Singh

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