इंसान नाम का राक्षस
- Hashtag Kalakar
- 39 minutes ago
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By Aditya Nandkumar Garde
जंगल था उनका घर, हमने बर्बाद कर दिया,
जानवरों ने पूछा, “क्या यही तुम्हारा इंसाफ़ था?”
छोटी सी जिंदगी थी, वो भी छीन ली इंसान ने,
आग भी लगाई, जान भी जलाई,
किस ज्ञान के घमंड में?
हिरन की भाग दौड़, परिंदों की चीखें,
सब थे अनजान इंसानी शैतान से,
तुमने कहा जंगल तुम्हारा है, पर भूल गए एक सच,
जिस दिन प्रकृति लौटेगी, उस दिन मत भूलना इस जीत का लालच।
न उनकी चीखें सुनी, ना उनका दर्द समझा,
वो बेजान नहीं थे, हर दरख्त में एक सांस थी,
उनकी एक ही गलती हुई, वो सिर्फ इंसान से अनजान थे।
पेड़ गिरते गए, और इंसान ऊंचा होता गया,
कुछ इस तरह, उन जानवरों को दफनाया गया,
वो भाग रहे थे इधर उधर,
बचा रहे थे अपनी जान अपने ही घर में,
इंसान ने कुछ इस तरह, प्रकृति का सम्मान किया।
एक पल के फायदे के लिए, तुमने सदियों का सुकून छीन लिया,
तुमने जंगल तो जलाया, पर सूरज से कैसे बचोगे?
बचने के लिए छाँव कहाँ से लाओगे?
एक जंगल का मासूम प्राणी,
जिसका कसूर सिर्फ इतना था,
वो जानवर जैसा इंसान नहीं था,
बस इसलिए उसका जीना गुनाह था।
उनका हर कदम जमीन को महसूस होता था,
और हमने जमीन ही छीन ली उनसे,
अपने फायदे के लिए।
एक माँ अपने बच्चों को छुपा रही थी इंसानों से,
और इंसान कह रहा था,
“ये तो सिर्फ जानवर हैं”।
जंगल की हर शाख, हर पत्ता बोल रहा था,
“मत करो यह”,
पर मसला यह था,
कि इंसान ही बहुत समझदार था।
वो ना बोल सकें, ना लड़ सकें,
पर आँखों में सवाल था,
“क्या सिर्फ इंसान को जीने का अधिकार था?”
जंगल रोता रहा, पर कोई आंसू देख न सका जमीन पर,
इंसान को जमीन दिखी ही नहीं ऊँचाई से,
इंसान राक्षस से इस तरह ऊपर जा रहा था।
क्या पाया तुमने, उनका घर तोड़ कर?
क्या जीत लिया, उनकी जान ले कर?
राक्षस तो कहानी थे, डराने के लिए,
पर इंसान असली खौफ है, प्रकृति के लिए,
अब कलम भी रो पड़ती है, जब सच लिखना पड़ता है,
इंसान नाम का राक्षस, खुलेआम फिरता है…
इंसान नाम का राक्षस, खुलेआम फिरता है।
By Aditya Nandkumar Garde

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