आख़िर कितना झूठा हूँ
By Wamiq Zia
कभी जो देखूँ ख़ुद को परदे पर
ख़ुद से बातें करने का मन होता है
मन होता है पूछूँ ख़ुद से
ख़ैरात मिले थे लफ़्ज़ जो तुमको
तुमने सबकी क़ऐ कर दी थी
एक लम्हा भी सोचा था क्या
अलफ़ाज़ के बीच की ख़ामोशी भी
एक कहानी कहती है
ख़ामोशी भी बोले थे क्या
या बस हुरूफ़ की वर्ज़िश की थी
सुर ताल संभाले रहते हो बस
अलफ़ाज़ के मानी कभी तो ढूँढो
कभी तो गाओ ख़ामोशी को
कभी तो छोड़ो रूह्पोशी को
सब से भागते रहते हो पर
किरदारों की आड़ में आकर
क्या ख़ुद से आँख मिला पाते हो
फ़क़त फ़रेब दिए हैं तुमने
आख़िर कितने झूठे हो!
मन होता है पूछूँ ख़ुद से
जो किरदार निभाए तुमने
जो संसार बसाये तुमने
उनसे कितने वाबस्ता हो
क्या जानते हो! क्या जानते हो
जिस झोपडी में किरदार रहे थे
वो धुप में कितनी तपती है
बरसात कभी हो जाए तो
कितने दिन गीली रहती है
जो बर्तन सेट (Set) पर आये थे
उनमें कभी जो खाना पक्के
एक बिसाइन्द्ह सी आती है
क्या जानोगे!
क्या जानोगे तुम के तुम तो
शिफ़्ट (Shift) के वक़्त पर आए थे
किरदार के कपड़े पहने थे
चेहरा मोहरा बनवाया था
और सिर्फ़ रेयाकारी की थी
अदाकारी कहते हो जिसको
फ़क़त धुआँ है
आग की आँच को तुम क्या जानो
फ़क़त फ़रेब दिए हैं तुमने
आख़िर कितने झूठे हो!
मन होता है पूछूँ ख़ुद से
ये जो मंज़र देख रहे हो
और सजे सँवरे बैठे हो
इक अफ़साना खेल रहे हो
जो अफ़साना खेल रहे हो
उसको कितना जानते हो
अफ़साने को बस पढ़ते हो
या महसूस भी करते हो
गर महसूस किया हो तुमने तो जानोगे
कितनी गहरी रात थी जब
हर इक लम्हा रोशन करके
लिखने वाले ने ज़हर पिया था
गर महसूस किया हो तुमने तो जानोगे
जो खेल रहे हो तुम वह खेल
किसी ने लिखा था जब, सोचा था
अंधियारे की कोख से जन्मा अफ़साना
कुछ दूर करेगा अंधियारों को
पर तुम क्या जानो
तुम तो अब तक
अंधियारे ही खोज रहे हो
फ़क़त फ़रेब दिए हैं तुमने
आख़िर कितने झूठे हो!
ख़ुद से बातें जो करना चाहूँ
एक अना आड़े आती है
हॉल (Hall) में बैठे लोगों की
फिर ताली गूँजने लगती है
ख़ुद पे फ़ख़्र सा होता है
सब से बातें होती हैं और
ख़ुद से बातें रह जाती हैं
अब जो शाम हुई है तो
इस मोड़ पे बैठा सोच रहा हूँ
फ़क़त फ़रेब दिए हैं मैंने
आख़िर कितना झूठा हूँ!
फ़क़त फ़रेब दिए हैं मैंने
आख़िर कितना झूठा हूँ!
By Wamiq Zia

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