आस्तीन के सांप
By Vikas Kumar
जन्नत से भी हसीन वो कल थे।
जिनमें हमारे साथ के कुछ पल थे।
सपनों से भी खूबसूरत वो जहां था।
मंजिलों की ओर हमारा कारवां था।
तुम्हारे गोद में मुझे ममता की छांव सी मिलती थी।
तुम्हारे कंधो पर मुझे सुकून भरी शाम मिलती थी।
इन सांसों में तुम्हारे सांसों की तलब सी मचती थी।
इन अधरों में तुम्हारे लबों की बस प्यास जगती थी।
इस बेइंतहा इश्क़ का आलम तुम्हें पता था मेरी हमनफ़स।
फ़िर भी इस रूहानी इश्क़ को कैसे कह दिया तुमने हव़स?
एक छोटे से पल में कैसे कर लिया तुमने इतना बड़ा फैसला।
मुझे लगता था की हमारा साथ है कई जन्मों का सिलसिला।
तुमसे हीं है ये इश्क़ का सिलसिला और फकत कुछ गिला।
क्यूं चुना ये फासला और बनाया गलतफहमियों का किला।
क्यूं फिर कभी सुनना हीं नहीं चाहा धड़कनों का ये काफ़िला।
दिल ए नादां में कयामत तक सुलगता रहेगा यही मसअला।
दूरियां बढ़ाने के तो सारे इंतजाम किए, दोस्तों से भी राय लिए।
दोस्त जो छोटी गलतफ़हमी को प्रेम का टूटा धागा बता गए।
टूटे धागा ना जुड़े, जुड़े गांठ पर जाई, वे ये मर्म भी समझा गए।
आस्तीन के सांप के डंक, एक हसीन से रिश्ते को झुलसा गए।
हमने हमेशा चाहा कि हम एक दूजे के फिर पास आए।
बाहों में सिमट कर तुझे रूहानी इश्क का एहसास कराए।
सांसों की मीठी तकरार के तूफान में गिले शिकवे मिटाए।
हसीन सफर में लगें, फिर मंजिलों की और कारवां बढ़ाए।
पर तुम इन दोस्तों की बातों में खो गए मुझसे दूर जाकर।
रिश्ते को सांपों के हवाले कर दिया तुमने फासले बढ़ाकर।
मैंने भी जिस्म सौंप दिया सांपों को दिल में आग लगाकर।
सांपों ने जी भर काटा खाया, जन्मों से बैठे थे घात लगाकर।
तुम्हे गलत कैसे कह दूं मै, तुम्हीं तो हो मेरी दिलरुबा।
इश्क़ का यही दस्तूर हीं है, इसका बस यही फ़लसफ़ा।
फकत खुद से हीं है कुछ शिकवे, खुदा से भी कुछ गिला।
ये इश्क़ रूहानी देकर, आस्तीन में इतने सांप क्यूं दिया?
इस रूहानी इश्क का अंजाम इतना बुरा तो नहीं होगा।
कभी न कभी इन नयनों को तुम्हारा दीदार तो होगा।
इस जहां में ना सही उस जहां में कुछ इसरार तो होगा।
जहां आस्तीन का कोई सांप हमारे दरमियान नही होंगे।
तेरे इन गुदाज़ बाहों में हम वहां सदियों तक खोए होंगे।
इन जुल्फों के साए में हम वहां कयामत तक सोए होंगे।
इस इश्क़ में हम भुला हीं देंगे अब तो ये दोनो जहां।
न परवाह ए मंजिल होगी ना होगा परवाह ए कारवां।
By Vikas Kumar

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