आसमान में घर बना लूं !
By Shivshankar Santosh Patwa
ज़मीन पे रहकर आँखों से न ओझल हुआ वो चेहरा
सोचता हूं, आसमान में घर बना लूं।
इन सिसकते बादलों में मुस्कुराती हैं यादें।
सोचता हूं, बादलों से दूर एक आशियाँ लूं।
हर पल दस्तक देती है, हमारी पुरानी आदतें
सोचता हूं, वक्त की दहलीज से अब फासला लूं।
झलकती लफ़्ज़ों में, लेहजे में, बीते कल कि बाँतें
सोचता हूं, बेलफ़्स़ सी किसी दुनिया में पनाह लूं।
ढूँढ़ता थक गया ज़माना, कोई अपना मिला नहीं
सोचता हूं, ख़ुदको ही अपना सबकुछ बना लूं।
दिल का कारोबार कहीं रूकता नहीं ज़मीन पर
सोचता हूं, इस ज़मीन से अपने निशान मिटा दूं।
सोचता हूं, आसमान में घर बना लूं।
By Shivshankar Santosh Patwa

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Nice lines 🤩
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