आशियां
By Dhruv Pandey
आओ चलते है।
कही फिर मिलते है।
जहां कोई नही है अपना वहा।
इक दुनिया बनाए,
जहां सपने न टूटे।
न पहने यहां हम,
यह झूठे मुखौटे ।
आ चलते है...
आओ चलते है,
नन्हे कदमों से मंजिल के लंबे रास्ते नापते है।
सारी फिक्र और परिशानिया को सफर में भुला देते है।
बेधड़क नाचकर, बेशर्मी से गाकर, पागल सा होकर तुम्हारे साथ रहना है।
फिर थक कर उस पेड़ की घनी छाओ में रात तक तुमसे बात करनी है।
तुम्हारे सामने अपने दिल की नग्न तस्वीर रखकर
आइना बनकर तुमको, तुमसे मिलाना है।
जब तुमसे मिला तब पता नही था की तुम मेरी जिंदगी के किताब में इतने सारे पन्ने लेकर बठोगी।
यह भी पता नही पता था की जब में 'best' 'favourite' जैसे शब्द सुनुगा तो तुम नज़र आओगी।
Text में भी मैं तुम्हारी आवाजों को सुन पता हूं।
उन्ही की रागनी में गुम सा हो जाता हूं।
चलते है,
इससे पहले इस दुनिया के सर्द में हम जम जाए।
इससे पहले दुनिया के गर्द में हम भी मिलकर थम जाए।
चलते है वहा
जहां केवल मै, तुम और अंधेरा हो।
क्योंकि अंधेरे में हम जख्म छुपाते नही
और लफ्ज़ फर्जी मुसखुराते नही।
छत से उस कोयले से काली रात के चादर पर ठाट-बाट से बैठे चांद को निहारना पसंद हैं।
मुझे सन्नाटे का रसीला राग पसंद है।
चांद की तरह तुम्हारा हर एक दाग पसंद है।
इस जिंदगी के दौड़ में एक पल मेरे साथ रुकोगी?
रूक कर, उगलियो में उगलिया फसाकर कुछ दूर साथ चलोगी?
इस ज़माने के शोर गुल में हमारी आवाज न खो जाए।
तो आओ चले सुकून से उल्फत की दुनिया बनाए।
By Dhruv Pandey

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