आशा निराशा
By NIDHI PALIWAL
आशाओं के बोझ तले कौन मरा है! वह तो निराशाओं से घिरे रहे। सपने सावन आते पतझड़ जाते रहे। उत्साह था आशाओं में निराशा में निर उत्साह; तब थी जीने की आस सहज, घाव तब भी हरे रहे। ढूंढ रहे थे उस कुछ निर में,
कि अब जो थोड़ा है वह बचे रहे। इस क्षण है, उस क्षण नहीं, पर जो था ही नहीं वह कैसे रहे। सोचते रहे क्या करें इन सब में, कि जो थोड़ा बचा है, कैसे रहे! आशा निराशा फिर भी आती-जाती रही हर दूसरी बात से उलझते रहे। की विषय अब महज आशा निराशा का नहीं; जद्दोजहद तो यह भी है कि इन सब में जिंदगी बनी रहे।।
By NIDHI PALIWAL

Comments