आवेदना
- Hashtag Kalakar
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By Ankita Nishad
आँसुओं के बदले में, सुख बेहिसाब लाकर देदे,
इन उठती गिरती पलकों को, वो एक ख्वाब लाकर देदे,
भगवान नहीं, वरदान नहीं, वो एक जवाब लाकर देदे,
रुखे प्यासे इन अधरों को, आब-ए-शबाब लाकर देदे।
असंतुलित भावनाओं को, वो एक हिसाब लाकर देदे,
तृष्णाओं में जलते तन को, कोई लिबाज लाकर देदे,
मेरे मन के अंधकारों में, घुटी हुई एक चीख है जो,
रिहा उसे करने कोई, कलम-किताब लाकर देदे।
रुस्वा रही उन रातों को, वो आफताब लाकर देदे,
बेवा बनी उन बाहों को, श्वेत नकाब लाकर देदे,
अमृत नहीं, आँसू सही, इस प्यासे मन को ला देना,
महँगा अगर पड़े वो भी, तो फिर तेज़ाब लाकर देदे।
शब्द पड़े कम, अश्क हुए खत्म, बस आहे ही बाकी हैं,
तेरे गलिहारों में बिछाने को, बस साँसे ही बाकी हैं,
कमजोर इतनी कभी न थी, इस तरह खो जाऊँ की,
झुकने तेरे दिदारों पे अब, बस लाशें ही बाकी हैं।
मरने का तेरे मेरे अंदर काश, कुछ ऐसा असर हो जाए,
जलती मेरी सपनों की आँच, कोई सैलाब लाकर देदे,
बुझ जाए मुझमें ऐसे तू की, रौशन मैं न हो पाऊँ कभी,
अंधियारा भी तेरा मुझमें पर, मैं बेहिसाब लाकर देदे।
By Ankita Nishad

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