आवारगी
By Sachin Madhukar Gote
क्यों मेरे साल मेरे गुजरे लम्हों की बिदाई है
जो है मासूम लफ्जों का सहारा तो खुदाई है।
और भी तो जाने क्या फसाने मेरे हिस्से में है
कहानी बस इतनी ही नहीं और भी अफसाने है।
यूं सिमट के बस इतनी ही मेरी आवारगी थी।
इस हलक से उस दीवार तक मुक्कमल हुई।
अब हो भी तो कोई अफसाना क्या हासिल है।
जो जिंदगी दो घड़ी में कामिल थी वही तकदीर है।
By Sachin Madhukar Gote

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