आधुनिकता या संवेदनहीनता
Updated: Jul 24, 2025
By Vandana Batra

आज पशु पक्षी भी होते होंगे देखकर हैरान ,
क्या चाहता है कलयुग का ये महत्वकांक्षी इंसान |
जो विवेक और बुद्धि उसे बनाती है जानवर से इंसान, उन्ही गुणों का न कर सका वह सम्मान।
क्या नहीं जानता वह कि भगवान के इशारे पर प्रकृति देगी उसके कर्मों का परिणाम।
अविवेक में खा रहा कुछ भी देने जीभ को स्वाद, नहीं मालूम उसे कि लिखा जा रहा कहीं उसके कर्मों का हिसाब।
जंगलों को काट रहा वहां भी पैर पसार, भूल गया कि दूसरे जीव भी हैं इस जमीन क़े हिस्सेदार |
धरती क्या कम थी कि आसमान में भी घोल रहा जहर, दूसरे ग्रहो पर पहुँच, वहां भी बनाना चाहता है महल।
कब तक सहेगी प्रकृति उसपे ढा रहा जो यह कहर, सबक देने वक्त आएगा ,अब तो जरा ठहर।
माया में उलझकर पाना चाहता है जीवन का आनंद, याद नहीं इसे कि ज़िन्दगी और मौत का है चोली दामन का सम्बन्ध।
खाने, पीने ,रहने का कर रहा हर वक़्त प्रबंध, शरीर की चिंता छोड़, कब करेगा आत्मा के विचार का आरम्भ।
पानी, हवा, मिट्टी और रोशनी दी ईश्वर ने हमपर होकर मेहरबान,
जैसे माँ बाप देते हैं बच्चे को उसके जीने का सामान।
पर हम दे न सके अच्छी संतान होने का प्रमाण,
उसकी दया और प्यार का जो हम पर है एहसान, उसे भूलकर, मनुष्य होने का चढ़ा है सिरपर अभिमान।
कुदरत ने तो दिए बार-बार हमें मौके, पर हम देते रहें पग-पग पर उसे धोखे,
आओ जरा रुकें ,इन प्रशनो के उत्तर खोजे, इस बनावटी बनते जीवन में, असली मैं के बारे में सोचें।
कर्म करना है पर कर्म बंधन में नहीं फंसना हैं हमे, जरूरतों को पूरा करना है पर असीमित इच्छाओं में नहीं उलझना हैं हमे,
आधुनिक बनना है पर संस्कारों का दामन थामे रखना है हमे।
जानवर बनने से बचना है पर, खुदको भगवान भी नहीं मान बैठना है हमे।
इंसान बनना है और इंसानियत का महत्व समझना है हमे।
By Vandana Batra

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