आधी विधवा
By Siya Rasik
मुझे दुनिया कि सब औरत आधी विधवा लगती है,
इसलिए नहीं कि कोई प्राकृतिक हादसा हुआ है,
बल्कि इसलिए कि ये सामाजिक और मानवीय हादसा है,
जो आदि अनादि काल से चल रहा है।
इस हादसे का ज़िम्मेदार कौन है,
सबको पता है,
पर जानने कि सबसे अहम बात ये है कि,
इस हादसे का जिम्मेदार ही, इसका सबसे बड़ा भुक्तभोगी भी है।
विकास की जितनी भी परिधारने हमने धरती पे खींची है,
सब मर्दों की परिधारनाएँ है,
और क़तार में जो औरतें आपको मर्दों से भी आगे दिख रहीं है
वो चली तो पूरी औरत बनने पर मर्द बन चुकी हैं।
ये इसलिए कि बाहर निकलना ही आधी विधवा के जंज़ाल से औरत को नहीं निकालता,
अच्छा काम करने, छोटे बड़े मोटे पतले कपड़े पहनने से कुछ नहीं बदलता,
दुनिया को बदलने से भी नहीं बदलता,
बदलता है औरत का औरत होने में।
लेकिन औरत को समाज ने आधा विधवा कर के रखा है,
क्यूँकि समाज डरता है, मैं डरता हूँ, आप डरते है,
डर है आपको .. कि आपके घर की औरत बदचलन न हो,
आज़ाद औरत से आपको डर लगता है।
और आपकी डर ही आपको कभी ऐसी औरत से नहीं मिलने देगा,
जो सच में औरत है।
आपके आसपास सभी,
आधी विधवा औरत होगी।
By Siya Rasik

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