आत्महत्या कभी कोई समाधान नहीं है।
By Budhraj Singh Khinchi
हर आदमी के जीवन में आत्महत्या का विचार कभी ना कभी ज़रूर आता है।
जब आदमी अपने ख़यालात में मृत्यु को कहीं न कहीं जीवन से आसान पाता है।
ऐसे ही मेरे मन में भी आत्महत्या का विचार अनेक बार आया।
लेकिन मैंने जीवन का मूल्य मृत्यु के सन्मुख हर बार अधिक पाया।
क्योंकि जीवन के संघर्षों से मिली विधायकता ने मुझे जीवन का यथार्थ मूल्य समझाया।
जिसे जीवनोद्देश्य समझते है लोग उससे इतर मुझे जीवन का यथार्थ उद्देश्य समझ आया।
लोग भौतिक जीवन की सफलताओं और विफलताओं को ही जीवन सत्य मानते है।
येन केन प्रकारेण अपने अहंकार पोषण को ही जीवन का यथार्थ् उद्देश्य जानते है।
इसलिए अपने मिथ्या अहंकार को चोट पहुँचते ही आदमी को जीवन व्यर्थ जान पड़ता है।
आदमी अपनी इहलीला को समाप्त कर अपने कभी ना छुटने वाले प्रारब्ध से ही लड़ता है।
पहली बार मुझे आत्महत्या का ख़याल आया।
जब मैंने अपने शैक्षणिक परिणाम को अपेक्षानुकूल नहीं पाया।
दुनिया भर की लानत मलानतों के बीच मैंने अपनी दृष्टि खुली रखी तो पाया।
ऐसे भी है लोग जिन्होंने शैक्षणिक जगत में असफल होकर भी दुनिया में अपना मक़ाम बनाया।
फिर मैंने आत्महत्या का विचार त्यागकर जीवन यात्रा में आगे की और प्रयाण किया।
अन्ततः मैंने महसूस किया कि मूर्ख ही थे वो जिन्होंने उपरोक्त कारण से ख़ुद का प्राण लिया।
दूसरी बार मुझे आत्महत्या का ख़याल आया।
जब मैंने प्यार की पींगे बढ़ाई और मुझे लगा मैंने प्यार में धोखा खाया।
बेहद शिद्दत से प्यार करने के बावज़ूद ख़ुद को अपने साथी के लिए टाईमपास ही पाया।
पूरा वज़ूद हिल गया उसके वादाखिलाफ़ी वाले इन्कार पर मर जाना जीने से आसान पाया।
बिना उसके जीना मेरा मुहाल हो गया।
जीने की आरज़ू ना रही हाल बेहाल हो गया।
थोड़ा ठण्डे दिमाग से सोचा मैंने तो समझ में आया।
अगर बेवफ़ा है वो तो खुशकिस्मत हूँ जो उसने ठुकराया।
अगर वफ़ा है उसके प्यार में कहीं और वो कहीं हालातों के आगे मज़बूर है।
तो भी क्या फ़र्क पड़ता है जिस्मानी दूरियों से जब वो दिल से नहीं दूर है।
इस तरह हमनें अपने इश्क़ को इबादत बना लिया।
मरने की बजाय प्यार को खुल के जीने का सबब बना लिया।
तीसरी बार मुझे आत्महत्या का विचार फिर से आया।
जब मैंने ख़ुद को व्यावसायिकता की दौड़ में पिछड़ा पाया।
क़र्ज़ में डूब गया रोम रोम लोगों के तक़ाज़ों से घबराया।
इसी संघर्ष में मुझे कर्मफल का सिद्धांत समझ आया।
मैं मृत्यु को वरणकर भी कर्ज़ से मुक्त नहीं हो पाऊँगा।
जो लिया है वो किसी ना किसी रूप में फिर से चुकाऊँगा।
तो मुझे दिल से कर्ज़ मुक्ति और सफलता के प्रयास करना चाहिए।
नियत ही नियति तय करती है इस सत्य का अहसास करना चाहिए।
नियति के खेल में ग़र मैं ही कर्ज़दार रहा हूँ तो इस कवायद में मेरा कर्ज़ पक्का चुक जाएगा।
वरना देनदार का ही पूर्व कर्ज़ चुका है ये सिद्ध होगा और नियति का चक्र पक्का रुक जाएगा।
इस तरह सत्य को अनुभूत कर मैंने फिर से जीवन का वरण किया।
इस तरह मैंने सारे अवसादों से ऊपर उठकर पूर्ण जीवन का चरण किया।
चौथी बार मुझे आत्महत्या का विचार तब आया।
जब मैंने अपने प्रियतम को हमेशा के लिए ख़ुद से दूर पाया।
वो जो बेहद प्यारा था जीवन की हर विषमता में सदा साथ रहने वाला सहारा था।
मेरी ख़ुशी ही जीवन था जिसका जो दूसरों की ख़ुशी के लिए हमेशा जीतकर भी हारा था।
थोड़ा सोचा मैंने तो पाया कि मैं मरकर क्या उसे ख़ुशी दे पाऊँगा मेरी ख़ुशी ही जिसका जीवन रहा है।
वो प्यारा हमदम मेरा दोस्त मेरा हमसफ़र जिसनें मेरी ख़ुशी की ख़ातिर जहन्नुम जितना दर्द सहा है।
अनुभव के तल पर जीते जीते समझ आया।
जीवन के साक्षात्कार ने गूढ़तम रहस्य समझाया।
अपने प्रारब्ध से पलायन का कोई विधान नहीं है।
वास्तव में आत्महत्या कभी कोई समाधान नहीं है।
मैं जीवन में जब तक असफल रहा मुझे कभी किसी ने भी नहीं अपनाया।
सफल होने पर मैंने पाया मुझे कोई प्यार नहीं करता सबको चाहिए माया।
आज मैं जान गया हूँ।
शाश्वत सत्य को पहचान गया हूँ।
जीवन सत्य को जानने के लिए लोगों को सही मायने में पहचानने के लिए असफल होना कितना ज़रूरी है।
कौन अपना है कौन पराया जानने के लिए अपने धैर्य को ठीक से पहचानने के लिए असफल होना कितना ज़रूरी है।
असफलता का शायद यही महत्व है।
जीवन वास्तविकता में तो अमरत्व है।
कोई भी कारण इतना सशक्त नहीं है जो मौत के आगे जीवन का मूल्य कम कर दे।
ये कविता तभी सार्थक है 'बुध' जब ये किसी जीवन से निराश बेदम में दम भर दे।
मेरी प्रेरणा से लोगों को जीवन का मूल्य समझ आए उन्हें जीवन से प्यार हो जाए।
जीवन का उद्देश्य ही है मृत्यु को जीतना वो जीवन ही क्या जो मृत्यु से हार जाए।
By Budhraj Singh Khinchi

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