आत्मविस्मृति
By Vikas Kumar
दहर में जिस्त को मिले तमाम खुशियां एक तरफ।
तेरे आगोश में मिली वो आत्मविस्मृति एक तरफ।
सभी खुशियों पर वो आत्मविस्मृति आज भी भारी है।
इस दिल की गलियों में तुम्हारी आज भी इंतजारी है।
यूं तो ये आत्मविस्मृति मुझे पल दो पल को हीं मिली।
ये मुझमें जगा गए वो सरगम जो सदियों से अधखिली।
यूं तो पहले बस लगता था मैं बस दो पल का हूं शायर।
सरगम में डूब के अब जाना मैं हर एक पल का हूं शायर।
वो पत्थर सी जो पलकें थी, अब अश्क भी उनमें बहते हैं।
वो सूखी सी जो ज़ख्में थी, अब दर्द भी उनसे छलकते हैं।
बस एक हीं स्वपन पलती है अब इस जिस्त की तन्हाई में।
फिर वो आलम ए आत्मविस्मृति हो इस रूह की पहनाई में।
पर इस दिल में मचलते अरमानो की हमेशा यही सुगबुहाट है।
तू तो नहीं है साथ मेरे पर तसव्वुरात में बस तेरी हीं आहट है।
मंजिलो की ओर पग बढ़ाकर स्वेद बहाकर खुश था कभी।
मंजिलों से दूर भटकता अश्कों में नहा कर खुश हूं अभी।
तेरे गोद में फिर उस आत्मविस्मृति में सोने को जी करता है।
जाने से पहले लिपट के तूझसे फिर रोने को जी करता है।
शायद ये पल मुझे मिले हीं नहीं कभी अब ये डर सताते हैं।
तेरा दीदार करने को हम फिर तसव्वुरात के जद में जाते हैं।
By Vikas Kumar

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