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आत्मनिर्भर

Dec 5, 2025
2 min read

By Vijeta


अपने सपनों को मैं पंख लगाना चाहती हूँ 

मैं भी अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ 

माना हज़ारों मुश्किलें आयेंगी मंजिल पाने में 

अपने सपनों को पाने की एक कोशिश करना चाहती हूँ 

घर का काम सीख लो ,पढ़ाई से घर का चौका ना जल पाएगा 

ज़िम्मेदारियाँ समझो, आगे यही काम आएगा 

जिम्मेदारियों से भागना नहीं, ज़िम्मेदारी बाँटना चाहती हूँ 

आत्मनिर्भर बन कर अपनी गृहस्थी चलाना चाहती हूँ 

एक लड़का पढ़ लिख कर घर की ज़िम्मेदारियाँ उठाता है 

एक लड़की को ही क्यों चार दिवारी तक सीमित समझा जाता है ?

मेरे भी कुछ सपने हैं , मेरे भी कुछ अरमान हैं 

कुछ करना चाहे एक लड़की जब ,क्यूँ कम पड़ता सम्मान है ?

शादी के बाद कैसे सब कुछ निभाओगी ?

थका हारा आयेगा पति जब , कैसे ध्यान रख पाओगी ?

बच्चो की जरूरतों को पूरी कर, क्या ख़ुद को भी संभाल पाओगी? 

ऑफिस का और घर का काम ,क्या संतुलन रख पाओगी ?

एक लड़की काम करे तो घर सिर्फ उसकी ज़िम्मेदारी है 

घर के काम करने में क्यों लड़के की नहीं भागीदारी है ?

समाज के नियम क़ानून में ,क्यूँ सिर्फ़ एक नारी ही हारी है ?

पुरुषों को कहाँ आता है सब ,ये एक नारी की ज़िम्मेदारी है !

कंधे से कंधा मिलाकर चलना, अब जरूरत हमारी है 

घर को खुशहाल रखने में होती दोनों की भागीदारी है 

गंगा सबके पाप धोकर भी ,पवित्र कहलाती है 

सबके सपने पूरे करके भी,नारी क्यों पीछे रह जाती है 

पुरुषों को क्यों कामगार मज़दूर दिखाया जाता है ?

पुरुषों को  क्यूँ, ज़िम्मेदारियों में मजबूर दिखाया जाता है ?

समानता का भाव जब एक दूसरे में लाएंगे 

सच्ची में उस दिन सुख दुख के साथी कहलायेंगे ।

हज़ारो मुश्किलों को पार कर ,अपनी खुशहाल दुनियाँ बना पाएँगे 

चल फिर काहें की अगर मगर ,चुन ले तू अपनी डगर ,

जी ले जीवन का ये सफ़र 

चल कुछ पल तू भी आराम कर , अपने सपनों को पूरा कर , बन तू भी आत्मनिर्भर


By Vijeta


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