आत्मगान
By Dr. Rohan Prabhakar
आसमान की काली रेत पर
खिला एक और सितारा !
अपने अनोखे अनकहे
आत्मगान के साथ,
नीरवता के साए में -
खामोशी को संजोये हुए …
ऐसे कई अनगिनत सितारें
कबसे खिले है… निःस्तब्ध
यु ही कही-
गुम हो जाने के लिए …
इस सन्नाटे को चीरती हुई
यह मेरी ही है शाश्वत ध्वनि
जो जोड़ रही है-
आसमान और सितरोंके साथ
मेरे आत्मगान को !
निःशब्द होकर …
By Dr. Rohan Prabhakar

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