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आता तरी मानवा हो जागा...

Oct 1, 2022
2 min read

By Shivanjay Ramesh Sayali Butere



काँक्रीटची जंगले उभारून आपण, उपभोग घेणं सोडत नाही | विकास जरी होत असला, पण शाश्वतता काही दिसत नाही || धरती माता अशक्त होऊनी, प्राण तिचा घुसमटतो आहे | आतातरी मानवा हो जागा, तू उधार वेळेवर जगतो आहे ||१|| प्रदूषकांच्या जोखडात या, छप्पर जगाचं कोसळत आहे | तापमानाच्या चढत्या आलेखात, आर्टिक, अंटार्टिक वितळत आहे || कधी उन्हाळा, कधी पावसाळा, वेळापत्रक सारे बिघडले आहे | आतातरी मानवा हो जागा, तू उधार वेळेवर जगतो आहे ||२|| उच्छाद मांडलाय प्रदूषणाने जीवसृष्टी गुदमरते आहे | चक्र सारं विस्कटलंय शेतीचं, शहरांच नियोजन कमी पडतंय || भोगवादी संस्कृती आपली, समतोल सारा ढासळला आहे | आतातरी मानवा हो जागा, तू उधार वेळेवर जगतो आहे ||३||


हक्कांसाठी भांडतो आपण, कर्तव्याची जाणीव असावी | राष्ट्र, नेते प्रयत्न करतायेत, वैयक्तिकही कृती असावी || उशीर तर केव्हाच झाला, पण वेळ अजूनही हातात आहे | आतातरी मानवा हो जागा, तू उधार वेळेवर जगतो आहे ||४||



Explanation:-


१) कॉन्क्रीट, सीमेंट के जंगल खड़े करके हम उसका उपभोग लेना छोड़ नहीं रहे हैं. भले ही विकास हो रहा है पर उसके sustainability दिख नहीं रही है. इसकी वजह से हमारी पृथ्वी माता कमजोर होकर उसका प्राण कम हो रहा है. इसलिए हे मानव तू जाग जा क्यों कि तू इस धरती माता ने दिए हुए उधार समय पर जी रहा है. २) प्रदूषण ने सारी जगह से हलचल मचाके रखी है इसलिए यह जीव सृष्टि /bio-diversity का दम घुट रहा है. खेती का पूरा चक्र बिगड़ा हुआ है , शहरों को भी योजनाए कम दिख रही है. कभी भी गर्मी तो कभी भी बारिश आने की वजह से पूरे साल की समय-सारणी/ Timetable बिगड़ी हुई है. इसलिए हे मानव तू जाग जा क्यों कि तू इस धरती माता ने दिए हुए उधार समय पर जी रहा है. 3) इस वातावरण में बहुत सारे अलग-अलग प्रदूषक/Pollutant होने की वजह से जो ओज़ोन लेयर का थर है ( जिसको हमने इस दुनिया की छत की उपमा दी है) वह धीरे-धीरे टूट चुका है. दिन भर दिन बढ़ते हुए तापमान की वजह से आर्टिक, अंटार्टिक भी पिघल रहे हैं. मनुष्य की इसी भोगवादी संस्कृति की वजह से सृष्टि का सारा संतुलन बिगड़ा हुआ है. इसलिए हे मानव तू जाग जा क्यों कि तू इस धरती माता ने दिए हुए उधार समय पर जी रहा है. ४) अंतिम चरण में लिखा है कि, अपने अधिकारों के लिए हम झगड़ते हैं, पर हमें कर्तव्यों की भी चेतना/ consciousness होनी चाहिए. सभी देश, उन देशों के नेता अपनी तरह से धरती माता को बचाने के लिए पूरी कोशिश कर रहे हैं, पर इसके साथ ही साथ हमारा भी व्यक्तिगत कुछ योगदान होना चाहिए. भले ही देर हुई है पर समय अभी भी हाथ में है. इसलिए हे मानव तू जाग जा क्यों कि तू इस धरती माता ने दिए हुए उधार समय पर जी रहा है.


वंदे मातरम !



By Shivanjay Ramesh Sayali Butere




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