आतंकवाद – एक पहेली
- Hashtag Kalakar
- Dec 10, 2025
- 1 min read
By Umang Agarwal
आज सुबह अखबार बड़े चाव से उठाया
सोचा था, आज नया वर्ष है
अख़बार में कुछ नया ही रंग होगा
पर,
अख़बार उठाते ही दिल दहल गया
पहले पन्ने पर
मोटे - मोटे अक्षरों में छपा था,
‘आतंकवादियों द्वारा बस में से उतार कर
तीस लोगों की निर्मम हत्या’,
एक साँस में पूरी ख़बर पढ़ ली,
फिर सोचा,
कि ये आतंकवादी आख़िर कौन हैं?
जो किसी का ख़ून करते समय
ज़रा भी विचलित नहीं होते
हत्या तो इनके लिए,
मानों, गुड्डे – गुड़ियों का खेल है
कि जब चाहा, जिसका चाहा,
ख़ून बहा दिया।
क्या ये लोग हैवान हैं,
या फिर शैतान हैं?
या ये किसी और लोक से आये हैं
जहाँ के निवासी हाड़-मांस के नहीं,
वरन्, पत्थर के बने होते हैं
जिनमें,
दिल नाम की कोई चीज़ नहीं होती।
क्योंकि,
इंसान के सीने में तो
एक ऐसा मासूम दिल होता है
जो किसी का ख़ून नहीं बहाता
बल्कि
इन पैशाचिक प्रवर्तियों को देख कर, रोता है।
आख़िर ये लोग हैं कौन?
कौन हैं ये?
जिन्होंने, समूचे देश में,
अपना आतंक फैला रखा है।
लोगों का जीना दूभर कर दिया है।
परंतु, मेरा यह प्रश्न,
मेरे सामने,
एक अबूझ पहेली की तरह खड़ा हुआ,
मानों,
मेरी हँसी उड़ा रहा है
हाँ, उसका उत्तर ना दे सकने के कारण,
वह मेरी हँसी ही तो उड़ा रहा है।
काश !
क्या कभी कोई मुझे,
मेरे इस प्रश्न का उत्तर दे पाएगा
या, यह सदा इसी तरह,
मेरी हँसी उड़ाएगा।
By Umang Agarwal

Bitter Reality
Loved reading this piece.
Very well written!
Beautiful!
Peace and humanity above all