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आजादी

Apr 23, 2024
1 min read

Updated: Jul 24, 2025

By Kushagra Singh


आजादी

आजादी सहकार नहीं लड़कर पायी जाती है 

कीमत इसकी भारी चुकाई जाती है 

पावन धरती को रक्त से किया कितनों  धूमिल हों हो कर 

कितनी माताओ ने धरती को सीचा अश्रुओ से धो धो कर 

राख प्राण हथेली पर आजादी को पाया जाता है 

यह है एक अनमोल रतन इसका भारी कर्ज चुकाया जाता है 

लड लड कर कितनों प्राणों की रांचक चाह न की 

सीने पर गोली खाकर भी जाने कितनों आह न की 

सह सहकार कितने लडते, कटते मिटते ही थे पर देशवीर बढ़ते भी थे 

जय जय भारत माता की बोल बोल हर देशवीर ने प्राण दिया

रह रह कर कितनों बंदूक उठाना थान लिया

लड़ लड़ कर शीश कलम करवा लेते पर माता पर आंच न आने देते 

धरती बनीं अंगार जानें कितने पत्थर पिघले 

कट कट कर गिरे शीश कई 

धरती अम्बर ने निगले कितने 

ना मुगल रहे ना अंग्रेज 

रह सका ना घोरी ना चंगेज 

टिक सकीं ना तुगलक कीं तलवार 

लडने को खड़ा देशवीर सज धज कर होकर वो तैय्यार 

है खड़ा अपनी पहचान मिटाने को 

अपनी पावन धरती को करने मुक्त 

खड़ा वो अपनी जान लुटाने को 

छिप सके वैरी दल से वो 

इतना वो सशक्त कहां 

सीच सके धरती के कण कण को इतना उसमे रक्त कहां 

सोच रहा हर क्षण हर पल वह 

ना पहचान रहे ना जान रहें 

कुछ भी करके 

ये देश सदा महान रहे 

आजादी को जन्म से नहीं करम से पाया जाता है 

कफन को रक्त से सजाया जाता है


By Kushagra Singh


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