आज़ादी का अम्रित महोत्सव कोई कैसे मनाए
- Hashtag Kalakar
- Apr 23, 2024
- 2 min read
Updated: Jul 21, 2025
By Mahendra Dhirajlal Kamdar

तक़दीरें सौ करोड़ की, सौ परिवारों की क़ैद में समाएँ,
कितनी सारी कड़वाहटों के तूफ़ान हम है दिल में दबाएँ,
ऐसी आज़ादी का अमृत महोत्सव कोई कैसे मनाए,
है यहाँ मुफ़्त की, तो वहाँ नफ़रत की राजनीति की वहशत,
है कहीं महँगाई की, और कहीं बेरोज़गारी की दहशत,
ऐसी वहशत के माहौल में ख़ुशियाँ कोई कैसे मनाए,
हर अख़बार की सुर्ख़ी, रोज़ ही बढ़ते घोटाले चमकाए,
हर गली, हर नुक्कड़ पे बे-ईमानो के परचम लहराएँ,
इतने घपलों-गुनाहों को तिरंगे से कोई कैसे छुपाए,
वा'दा है संवैधानिक, सब को मिलेगा बराबर का मौक़ा,
निहत्थों का युद्ध सेना से, ये मज़ाक़ है या है कोई धोका,
इतने धोके खा कर, उन वा'दों पे विश्वास कोई कैसे टिकाए,
हर सरकारी अफ़सर अच्छे नागरिकों को सदा धमकाए,
तारीखों के भाँवर में इंसाफ़ सदा गुमराह हो जाए,
इतनी ना-इंसाफ़ीयों को सह सह कर भी कोई कैसे मुस्कुराए,
यहाँ पर आबादी, भ्रष्टाचार ही सदा रहें है आबाद,
यहाँ अविश्वास पर टिकी हुई सारी व्यवस्था है बर्बाद,
ऐसे राक्षसी मसलों को आख़िर कोई कैसे सुलझाए,
देश के रहनुमा ही जाती, कभी धर्म के नाम पे लड़वाए,
मुल्क के ठेकेदार ही सत्ता के नशे में बे-ख़ुद नज़र आएँ,
ऐसे मंज़र में मंज़िलों को हासिल कोई कैसे कर पाए,
बँट गया है देश, मुट्ठी-भर लोगों में जागीरों की तरह,
भ्रष्टाचार के दीमक खा चुके, सब बुनियादें बुरी तरह,
भ्रष्टाचारी जागीर-दारी से अब देश को कैसे बचाए,
हर क्षेत्र में यहाँ तो बस आरक्षण की ही बोल-बाला है,
क़ानून से भी कुछ लोगों ने ख़ुद को बड़ा कर डाला है,
जहाँगीरी न्याय की वो घंटी को हम कहाँ जा के बजाएँ,
व्योपार हो या हो राजनीति, बस वंशवाद है हर-सू,
कैसे बदलेंगे रस्म-ओ-रिवाज कैसे करेंगे क्षमतावाद,
ऐसे अंतिमवाद से देशके बुद्धि-धन को कैसे बचाए,
लाभ हो तो यहाँ मेरा है, हानि तो यहाँ जनता की है,
हक़ हो तो मेरा है, ज़िम्मेदारीयाँ हो तो हमारी है,
मुनाफ़ा'-ख़ोरों का ये ना'रा है कि सारा देश हमारा है,
ग़ुलामों की तक़दीर कहाँ बदले मालिक के बदलने से,
ऐसे ख़्वाब का फ़ल ना बदले आँखों के खुल जाने से,
कैद में रहनेवाले ये लोग आज़ादी के ना'रे कैसे लगाएँ,
कहीं से कोई तो उभरे जो भारतीयता का गौरव जगा जाए,
मेरा भारत महान, इस का कोई और तो प्रमाण मिल जाए,
हमें कोई तो बताए, जूठी उम्मीदों के दिये क्यों जलाएँ,
क्या करें तदबीरें, कैसे बदलें आवाम की तक़्दीरें,
जनता को रामराज के जूठे ख़्वाब के इलावा कुछ
और तो हाथ आए, देर से ही सही सच्चा स्वराज तो आए,
कब से बैठे हैं आश लगाएँ, काली रात अब तो ढल जाए,
सुनहरी सुब्ह कभी तो उगे, कुछ अच्छे दिन कभी तो आए,
काफ़िर की ये बन्दगी की काश ये पुकार तू सुन पाए,
राम-किशन की भूमि की वो धरोहर कोई तो ढूंढके लाए,
कोई एक तो सच्चा बन जाए, काश हमें अब कोई तो जगाए,
के बिना जागे अँधेरी रात की भोर कोई कैसे देख पाए,
आओ वतन पे फ़िदा हो जाएँ, चलो जाँ निसार कर जाएँ,
आओ कि हम बिना जताएँ, आओ कुछ अच्छा कर जाएँ,
आओ फिर हम अपनी सच्ची आज़ादी का ये जश्न मनाएँ.
By Mahendra Dhirajlal Kamdar

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