top of page

आज़ादी का अम्रित महोत्सव कोई कैसे मनाए?

Oct 11, 2022
2 min read

Updated: Dec 1, 2022

By Mahendra Dhirajlal Kamdar






सौ करोड़की तक़दीरें, सौ परिवारोंकी कैदमें समाए,

इतने ज़हरोंकी कड़वाहटों का समंदर दिलमें दबाए,

हमें कोई तो बताए,

ऐसी आज़ादी का अम्रित महोत्सव कोई कैसे मनाए,


कहीं मुफ़्तकी, कहीं नफ़रतकी राजनीतिकी वहशत,

कहीं महँगाई की, तो कहीं बेरोज़गारी की है दहशत,

हमें कोई तो बताए,

ऐसी वहशत के माहौल में ख़ुशियाँ कोई कैसे मनाए,


हर अख़बारकी सुर्ख़ियाँ, रोज़ बढ़ते घोटाले चमकाए,

हर गली हर नुक्कड़पे बेईमानीयोंका परचम लहराए,

हमें कोई तो बताए,

इतने ग़फ़लों-ओ-गुनाहोंको तिरंगेसे कोई कैसे छुपाए,





समानता है संविधानका वादा, सबको देता है समान मौका,

निहत्थों की है सेनासे लड़ाई, ये मज़ाक है या है कोई धोका,

हमें कोई तो बताए,

इतने धोके खाकर, उन वादों पर भरोसा कोई कैसे टिकाए,


जहाँ ईमानदार को इनाम में हर सरकारी मुलाज़िम धमकाए,

जहाँ इंसाफ़ तारीखोंकी भरमारमें जाने कहाँ गुमराह हो जाए,

हमें कोई तो बताए,

इतनी नाइंसाफ़ीयों को सह सह कर भी कोई कैसे मुस्कुराए,


जहाँ बेईमानी, भ्रष्टाचार और आबादी ही सदा रहें है आबाद,

जहाँ अविश्वासकी बुनियाद पे टिकी हुई ये व्यवस्था है बर्बाद,

हमें कोई तो बताए,

ऐसे अनगिनत राक्षसी मसलोंको आख़िर कोई कैसे सुलझाए,


देश के रहनुमा ही कभी जाति कभी धर्म के नाम पे लड़वाए,

इस समाजके ठेकेदारही जहाँ सत्ता के नशेमें बेख़ुद हो जाए,

हमें कोई तो बताए,

ऐसी रहनुमाई पाकर मंज़िलोको हाँसिल कोई कैसे कर पाए,


जहाँ बँट गया है हिंदुस्तान, मुट्ठीभर लोगोंमें जागीरों की तरह,

कहें किस राजनीति से, खाये वंशवाद जिसे दीमकों की तरह,

हमें कोई तो बताए,

किसी और की ये जागीर को अपना हिस्सा कोई कैसे बनाए,


जहाँ हर क्षेत्र हर व्यवस्था में आरक्षण की बोलबाला है,

क़ानून से भी कुछ मुट्ठीभर लोगों को मुक्त कर डाला है,

हमें कोई तो बताए,

कहाँ है जहाँगीरी क़ानूनकी घंटी, उसे कहाँ जाके बजाए,


मालिक बदल जानेसे ग़ुलामोंकी तक़दीर नहीं बदला करती,

नींदके खुल जानेसे बुरे ख़्वाबोंकी ता'बीर नहीं बदला करती,

हमें कोई तो बताए,

एक कैदसे दूसरीमें जाकर आज़ादीके नारे कोई कैसे लगाए,


ऐ ख़ुदा, बंदगी-ए-"काफ़िर" की काश ये पुकार तू सुन पाए,

राम-किशन की संस्कृतिकी वो धरोहर कोई तो ढूंढके लाए,

कोई एक तो सच्चा बन जाए, काश हमें अब कोई तो जगाए,

की बिना जागे इस अँधेरी रात की भोर कोई कैसे देख पाए,


हमें कोई तो बताए,

जूठी उम्मीदों के दिये कोई कैसे जलाए, कैसे जलाते जाए,


हमें कोई तो बताए,

आज़ादी का अम्रित महोत्सव कोई कैसे मनाए, कैसे मनाए.



By Mahendra Dhirajlal Kamdar




Recent Posts

See All
Dumb or In Love

By Kavya Mehulkumar Mehta are poets dumb — or just in love? to the world, they may seem dumb, but for them, love is inevitable. poems are reminders of love that can’t be forgotten, shan’t be forgotten

 
 
 
A Future So Azure

By Inayah Fathima Faeez Tomorrow looms unsure, muffled by the deep Thumbs twiddling, barriers never-ending, failure and nothing to reap At the shore lie the choices, imposing, leading to journeys impo

 
 
 
Letting Go In Layers

By Inayah Fathima Faeez Some part of us is cold and shrivelled, In a body of seemingly endless depth. Some part of us is heavy and dishevelled, Misery filling an unending breadth. Some part of us is

 
 
 

Comments

Rated 0 out of 5 stars.
No ratings yet

Add a rating
bottom of page