आज की रात
By Wamiq Zia
बहुत तवील है आज की रात
उम्र कट जाएगी, रात बसर करते
बहुत ग़मगीन है आज की रात
साँस रुक जाएगी, रात गुज़र करते
बहुत तरीक है आज की रात
हर शम्मा बुझ जाएगी, आज सेहर करते!
रात दर ब दर भटक रही है
रात अंगार पर सुलग रही है
रात मेयार से उतर रही है
रात एक ख़्वाब से उलझ रही है
मसीहाओं की शिकस्त है आज की रात
आज की रात सब ज़ख़्म उभर आए हैं
अमीर ए शहर तंग-दस्त है आज की रात
आज की रात फ़ाक़ाकश मुस्कुराए हैं
लबों पे हादसा–ए-हस्त है आज की रात
आज की रात ब-अंदाज़-ए-दिगर आए हैं
नज़्म - आज की रात
कवि - वामिक़ ज़िया
रात हर याद से गुज़र रही है
रात हर बात से उखड़ रही है
रात सायों सि बढ़ रही है
रात बस करवट बदल रही है
कितनी बेबस-ओ-नाशाद है आज की रात
हर सदा नवा-ए-दर्द का गहवारा है
कितनी बेहिस-ओ-बर्बाद है आज की रात
मेरा चारागर, किस क़दर बेचारा है
मिस्ल-ए-ख़ानाख़राब है आज की रात
ज़ेर-ए-इश्क़ थी, अब कू-ब-कू आवारा है
By Wamiq Zia

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