आज कल
- Hashtag Kalakar
- Dec 15, 2025
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By Kavita Batra
मन में , प्रेम भाव नहीं रहा ,
जरूरतों का दौर चल पड़ा,
यहाँ किसी का कोई मोल नहीं रहा ।
जितने तुम मेरे हो, उस मेें भी थोड़े से ज्य़ादा का , हिसाब नहीं रहा ,
बातें तो ,सभी कर लेतें हैं, मगर ,
सब्र का अब चलन नहीं रहा ।
दौड़ की मसरूफीयत चल रही है ,
बैठकों का सिलसिला नहीं रहा ,
धर्म का ज्ञान बट तो गया है,
मगर ,अब , मौन वाला सबब ,
किसी में नहीं रहा ।
By Kavita Batra

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