आगे बढ़ने की उम्मीद
By NIDHI PALIWAL
जैसे हम में से कुछ कभी आगे बड़े ही नहीं। कहीं किसी दौर में, जिंदगी के किसी पढ़ाव पर, जैसे काल के असामयिक चक्र में फसे हुए हैं। जिसका ना आज है ना ही कल। जैसे अभी भी वैसे ही ठहरे हुए हैं इंतजार में, कि कोई आएगा और झंझोड़कर,
गहरी नींद से जगाकर कहेगा; उठ जा! अब उस लंबी काली रात के बुरे सपने के खत्म होने का समय है। कि उस तपती दोपहर में जलते सूरज को सांझ में विलीन होने का समय है। कि वर्तमान ही एकमात्र सच्चाई है। कि भूत या भविष्य में रहना, जैसे अकाल कैदखाने में रहने जैसा है। जिसका कोई अस्तित्व ही नही। वह बस तुम्हारे डर के बीज का फल है जिसे बिना रोशनी मुरझा जाना था पर तुम अंधेरे में भी अपनी आभा से जिसे सींचते रहे। तुम उठते हो उस दिन की ओर कभी ना मुड़ने को। कभी ना रात के साए में फिर गुम हो जाने को। पर क्या यही अंत है! तुमसे ना जाने कितने समय के किसी हिस्से में किसी अंजान कोने में, सहमे सिकुड़े से हैं इसी आस में, कि कोई तुमसा ही हाथ थाम कर उन्हें कभी ना ढलने वाली रोशनी तक का रास्ता बताएगा यह कहेगा कि दिन अभी बाकी है और डूबता सूरज दुनिया का अंत नहीं बल्कि नये दिन के उदय की उम्मीद है।
By NIDHI PALIWAL

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