आग़ाज़
- Hashtag Kalakar
- Dec 12, 2025
- 1 min read
By Anjali Kumari
सुनो! अन्याय जब-जब हो किसी को उठना पड़ता है
समय अब आ गया देखो, नया अध्याय खुलता है।
सताए जो भी जाते हैं, वह कुछ दिन शांत रहते हैं
पलटकर फिर नए युग का वही आग़ाज़ करते हैं।
जगेगा ये जगत फिर से, कि सब को होश आएगा
दबी थी चेतना सब की, उसे अब वह उठाएगा।
समय की माँग रहती है, कि खुद को दोहराना है
चला जो कल गया था कल उसे फिर लौट आना है।
बदलती आत्मा क्या है भले तन बदले ये जितना?
पुरानी सोच का तय है नए आकार में ढलना।
दलित, स्त्री, आदिवासी हो या हो कोई विमर्श और
धुरी है एक ही सब की, करें जो हम ज़रा भी ग़ौर।
पड़े जो हाशिए पर वर्ग हैं उनको उठाना है
उठाकर मुख्य धारा में उन्हें लेकर के आना है।
नियम कानून बनते हैं कि वे मजबूत हो जाएँ
दिया जाता है फिर मौका कि वे आज़ाद हो पाएँ।
वे प्रेरित करते हैं सब को, दशा के ठीक होने पर
बग़ावत करता कोई वर्ग प्रेरित इनसे फिर होकर।
विचारों के इन्हीं दम पर तो विकसित देश बनते हैं
इन्हीं के दम पर शोषित वर्ग देखो आगे बढ़ते हैं।
समय ने फिर चला है चाल, करवट बदली है फिर से
खड़ा इक वर्ग है फिर, क्रांति की तैयारी है फिर से।
अभी तक मानते थे नारी का है आदमी शोषक
मगर चंद वाक्यों ने तथ्य खोला है बड़ा रोचक।
विमर्शों की नई सूची को फिर तैयार होना है
पुरुष के नाम पर अब एक नया आग़ाज़ होना है।
By Anjali Kumari

बहुत सुंदर कविता
This doesn't seek blame - it seeks fairness, compassion and truth. Quietly powerful.
love your vision
Amazing 😍
❤️❤️❤️❤️