आखिरी चेहरा
By Sushant Saurabh
उठा, चला,
थोड़ा रुक गया ।
मां के सुर्ख गाल
उसपे रेंगते सफेद अश्रु
लड़खड़ाते बोल,
प्रेम के।
झुका, दोनों हाथों से चरण स्पर्श
उठा, फिर झुका।
थोड़ा ।
गले लगाया, मेरी शर्ट थोड़ी गीली
थोड़ी पसीने से, थोड़ी आंसू से
बैग लटकाया, घूमा, चल पड़ा,
चारदीवारी आई, दरवाजा खोला
बाहर निकलने ही वाला
थोड़ा रुक गया ।
गहरी सांस।
फिर चल पड़ा।
आंखों से ओझल होने से पहले,
एक आखिरी बार
पलटा।
जैसे आखिरी मुलाकात हो।
अगर वापिस न आया
तो स्मृति में अंकित हो गया
धुंधला सा, दरवाजे के फाँक से
छिपता हुआ
एक चेहरा।
वर्तमान समय :
घर से दूर,
बहुत दूर।
यादें उलझी हुई,
सुलझाने की कोशिश
सारा चेहरा लापता
बस एक चेहरा, जेहन में
वो आखिरी चेहरा।
अगर मैं पलटा न होता,
तो क्या होता!
क्या मैं उन गुमशुदा चेहरों
को ढूंढ पाता?
शायद नहीं।
By Sushant Saurabh

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